उत्तराखंड बाढ़ 2013 (2013 UTTARAKHAND FLOODS) का संक्षिप्त विवरण
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| उत्तराखंड बाढ़ 2013 |
भारत को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक सुरक्षा प्रदान करने वाला हिमालय पिछले कुछ दशकों से विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हो रहा है। जिसके कारण धन एवं जन की हानि हो रही है। 16 एवं 17 जून 2013 को तेज वर्षा से प्रेरित भूस्खलन ने मन्दाकिनी नदी एवं उसकी उपशाखाओं की धारा को रोककर अल्पकालिक झील का निर्माण कर दिया। तथा बादल के फटने से आयी त्वरित बाढ़ ने बस्तियों एवं सड़कों को बहा दिया और उत्तराखंड में विशेष कर केदारनाथ क्षेत्र में ऐसा विनाश किया जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। अर्थात केदारनाथ ही नहीं, नदी के बहाव के साथ आगे बढ़ते हुए रामबाड़ा गौरीकुंड, सोनप्रयाग, चंद्रापुरी, अगस्त्यमुनि और श्रीनगर जैसे इलाकों में भी कुदरत ने जमकर तबाही मचाई। यह तबाही किसी एक दिन आई बाढ़ से नहीं हुई बल्कि दो तीन दिन तक अलग - अलग जगह पुरे राज्य में तांडव होता रहा। केदारनाथ में हुई बरबादी तक़रीबन 24 घंटे की टाइमलाइन पर बिखरी हुई है।
हमारे दायित्व
केदारनाथ क्षेत्र में इतनी बड़ी आपदा पहली बार हुई है। इसी तरह से बादल का फटना, भूस्खलन, नदी की धारा बाधित होना, अल्पकालिक झील का निर्माण, झील का बर्स्ट होना एवं त्वरित बाढ़ का आना एवं अवसादों के अपवाहित होने की घटना गंगोत्री हिमनदीय क्षेत्र में है। इस तरह की घटना इस बात का सन्देश देती है। की प्राकृतिक घटनाएं मानव नियंत्रण एवं पुन: अनुमान से परे है। लेकिन इतना अवश्य है की बेहतर नियोजन एवं प्रबंधन के द्वारा इन आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
अर्थात आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भी बस्तियां बनाई गई। आज हम प्रकृति के साथ नहीं बल्कि उसकी कीमत पर विकास कर रहे है। यह समस्या सिर्फ किसी व्यक्ति, गांव, नगर शहर या राज्य की समस्या नहीं है अपितु यह पुरे जनमानस की समस्या है। सभी इसके निराकरण के लिए प्रयासरत है फिर भी यह समस्या दिनों दिन विशालकाय होती जा रही है। आज मानव का अस्तित्व अपने ही क्रियाकलापों के कारण खतरे में दिखायी दे रहा है। अत: इसके समाधान के लिए जन - जन की सहभागिता की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
अगर उत्तराखंड में वननाशन न हुआ होता, डायनामाइट का वृहद प्रयोग न हुआ होता , भूस्खलन के क्षेत्र में मकान न बने होते एवं नदी के धर में बस्तियां न होती तो सम्भवता जीवन एवं सम्पदा की उतनी बर्बादी नहीं होती जितनी इस आपदा के दौरान हुई है। यदि हम प्रकति का सृजन नहीं कर सकते तो हमें उसका विध्वंस भी नहीं करना चाहिए। हमें उसकी रक्षा करनी है। एवं प्राकृतिक नियमों एवं वैज्ञानिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए। ऐसा विकास करना है। जिसमे पर्यावरण भी प्रदूषित न हो। " प्रकृति भी संरक्षित रहे एवं प्राकृतिक संसाधन भी आने वाले पीढ़ी के लिए बचे रहे।
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