Gupt Kaal Me Samajik Vyavastha And Important Facts

Rajkumar Yadav
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 गुप्तकाल में सामाजिक व्यवस्था और महत्वपूर्ण तथ्य



गुप्तकाल में, समाज चार वर्णों में बंटा हुआ था। इसकाल में भी ब्राम्हणों की सर्वोचता थी। और ब्राम्हणों के निम्न 6 प्रकार के कार्य बताए गए है -
  1. अध्ययन 
  2. अध्यापक
  3. यज्ञ करना 
  4. यज्ञ करवाना 
  5. दान करना
  6. दान लेना
मनुस्मृति में कहा गया है की 10 वर्ष का ब्राम्हण 100 वर्षीय क्षत्रिय से श्रेष्ठ है। और इस काल में ब्राम्हण क्षत्रिय का संबंध पिता पुत्र तुल्य बताया गाय है। और गुप्तकाल में नरसिंह पुराण के अनुसार, कृषि कार्य को शूद्रों का कार्य बताया गया है। एवं मार्कण्डेय पुराण में ये भी बताया गया है की शूद्र दान देने और यज्ञ करने का कार्य भी कर सकते है। तथा गुप्तकाल के ग्रंथों में बताया गया है की ब्राम्हाणों को शूद्रों के यहाँ भोजन नहीं करना चाहिए। लेकिन वही मनुस्मृति में कहा है की अकाल के समय वे शूद्रों से अनाज ले सकते है। तथा ब्राम्हण पुरुष और शूद्र कन्या से उत्पन्न संतान को पाराशव कहा गया है। और ब्राम्हण पुरष व वैश्य स्त्री से उत्पन्न संतान अम्बष्ट कही गयी है तथा क्षत्रिय पुरुष व शूद्र स्त्री से उत्पन्न संतान -उग्र कही गई है।
मनुस्मृति ने स्त्रियों को उत्तराधिकारी नियम में कहा गया है की उन्हें पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं होना चाहिए। क्योकि वे स्वयं संपत्ति होती है। जबकि याज्ञयबालक स्मृति में पिता -पति दोनों की संपत्ति का उत्तराधिकारी माना गया है।

गुप्तकाल में स्त्रियों की दशा

गुप्तकालीन साहित्य एवं कला में नारी का आदर्शत्मक चित्रण किया गया है। लेकिन व्यावहारिक रूप में उनकी स्तिथि पहले से अधिक दयनीय थी।
इसकाल में दहेज़, प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा का उल्लेख प्राप्त होता है। तथा विधवा विवाह को पहले की अपेक्षा समर्थन कम हो गया था। 
और इस काल में हमें देवदासी प्रथा भी देखने को मिलती है।

गुप्तकाल में आर्थिक जीवन

गुप्तकाल आर्थिक दृष्टि से समृद्ध एवं संपन्न था। और अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। और इसकी जानकारी हमें वृहद संहिता से प्राप्त होती है। इतिसींग के अनुसार इस काल में मुख्य फसल चावल और जौं थी। लेकिन कालिदास ने ईख गन्ने और धान का उल्लेख किया है। 

स्थान

व्यापारिक श्रेणी

इंदौर तेलीय संघ
विदिशा हाथी दांत के कारीगर
उज्जैनी अनाज व्यापारी
नासीक बुनकर संघ
मंदसौर रेशम बुनकर संघ
मथुरा गेहूं आरा पीसने वाले कारीगर
कौशाबी इत्र बेचने वाले

तथा मंदसौर के रेशम बुनकर संघ ने, मंदसौर में सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। और इसके लिए तेल की व्यवस्था इंदौर संघ ने की थी।
तथा इस काल में व्यापर विदेशी राज्यों के साथ भी किया जाता था।

गुप्तकाल में धार्मिक दशा

गुप्तकाल में ब्राम्हणों का पुर्नउत्थान माना जाता है। इस काल में सर्वाधिक भागवत धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। तथा चन्द्रगुप्त ने स्वयं को परम भागवत कहा है। तो वही स्कंदगुप्त ने लक्ष्मी का वर्णन करते हुए चित्र अंकित करवाए है। 
तथा भागवत धर्म के बाद शैव धर्म भी चरम पर था। और गुप्तकाल में बौद्ध धर्म व जैन धर्म भी अपना अस्तित्व बनाए हुए थे।

गुप्तकाल में कला व साहित्य

कला व साहित्य की दृष्टि से गुप्तकाल को क्लासिकल युग या स्वर्णयुग का दर्जा प्राप्त किया गया है। और इस काल में मंदिर कला सर्वप्रथम दिखाई देती है। पहला साँची में सपाट छत वाला मंदिर और इसके पश्चात् नागर शैली का उद्भव हुआ। जिसमे शिखर युक्त मंदिर है। और इस काल का पहला मंदिर देवगढ़ का ईशावतार मंदिर था। इसके अलावा घुमरा "नागौर" का शिवमंदिर, दिगमा "जबलपुर" का विष्णु मंदिर। शिवपुर का लक्ष्मण मंदिर। और उदयगिर "विदिशा" का विष्णु मंदिर। तहत भीतर गांव "कानपूर" में ईटों का मंदिर प्रमुख है।

गुप्तकाल में अजंता की गुफा व बाघ की गुफा, अजंता की गुफाएं 16, 17, 19 गुप्तकाल में मानी जाती है। और ये गुफाएं घोड़े की नाल की आकृति में बनी हुई है।

बार्नेट के अनुसार "प्राचीन भारत इतिहास में गुप्तकाल का वह महत्व है। जो यूनान के इतिहास में पेरिक्लीन युग का है। "
स्मिथ ने गुप्तकाल की तुलना ब्रिटिश इतिहास के एलिजा बेध तथा स्टुअर्ट के कालो से की है। और गुप्तकाल को श्रेष्ठ कवियों का काल भी कहा जाता है।

गुप्तकाल की प्रमुख पुस्तकें

मालविकाग्निमित्रम कालिदास अग्निमित्र व मालविका की प्रणय -कथा पर
विक्रमोर्वशीयम कालिदास सम्राट पुरुखा व उर्वशी अप्सरा की प्रणय -कथा पर
अभिज्ञानशकुन्तम कालिदास दुष्यंत, शंकुतला प्रणयरूपी
ऋतुसंहार कालिदास -
मेघदूत कालिदास -
कुमारसंभव कालिदास -
रघुवंशम कालिदास -
मुद्राराक्षस विशाखदत्त चन्द्रगुप्त मौर्य के मगध पर सिंहासन
देवीचंद्रगुप्तम विशाखदत्त चन्द्रगुप्त-द्वितीय द्वारा, धुर्व-स्वामिनी विवाह

तथा उदयगिरि "विदिशा" की गुफाओ में विष्णु का वराहावतार की विशाल मूर्ति स्थापित है। जो चन्द्रगुप्त के सेनापति वीरसेना शाव ने बनाई थी।

काव्य दर्शन दण्डिन
दशकुमार चरित दण्डिन
चारुदत्तम भास
अरुमंग भास
किरातअर्जुनियम भारती
रावण वध वत्सभट्टी
अमर कोष अमर सिंह
चंद्र व्याकरण चन्द्रगोमी
वृहद संहिता बराहमिहिर
पंच सिद्धान्तिका बराहमिहिर
ब्रह्मा सिद्धांत आर्यभट्ट
आर्यभट्टम आर्यभट्ट
शून्य सिद्धांत आर्यभट्ट
पंचतंत्र विष्णु शर्मा
नीतिशास्त्र कामन्दक
कामसूत्र वात्सायन
मृच्छकटिकम शूद्रक
लीलावती भास्कराचार्य

विज्ञानं के क्षेत्र में हमें गुप्तकाल में विकास देखने को मिलता है। और गुप्तकाल में ही शून्य सिद्धांत व दशमलव प्रणाली प्रारंभ हुई। तथा शून्य का प्रयोग करने वाले पहले व्यक्ति आर्यभट्ट थे। 
और इन्हे दशमलव प्रणाली का जनक भी माना जाता है। तथा आर्थिक उपयोगिता की दृष्टि से भूमि के कई प्रकार बताए गए है। 

  • क्षेत्र: कृषि के लिए उपयोगी भूमि।
  • खिल: जो भूमि जोती न जाए। 
  • अप्रहाद: जंगल। 
  • चारागाह: पशुओं को चराने अथवा चरने का स्थान। 
  • वास्तु: वास योग्य भूमि (रहने योग्य)
गुप्तकाल में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। तथा श्रेणी के प्रधान को ज्येष्ठक कहा जाता था। और गुप्तकाल की मुद्राओं को अभिलेखों में दीनार कहा गया तथा चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास है। और डॉक्टर धन्वन्तरि थे। और गुप्तकाल की राजकीय भाषा भी प्राकृत थी। 

गुप्तोत्तर काल

गुप्तकाल के पतन के बाद भारतीय राजनैतिक इतिहास में क्षेत्रीयता की भावना का उदय हुआ। जिसके कारण नए राजवंशों का भी उदय हुआ।

राजवंश

स्थान

मैत्रक वंश वल्लभी
मोरवरी वंश कन्नौज
पुष्यभूति थाणेश्वर
पार्वतीगुप्त मगध
चंद्र / गौढ़ बंगाल

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