Chernobyl Parmanu Sanyantra Trasdi 1986 In Hindi

Rajkumar Yadav
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चेरनोबिल परमाणु संयंत्र त्रासदी 1986

Chernobyl Parmanu Sanyantra Trasdi 1986 In Hindi
चेरनोबिल परमाणु संयंत्र त्रासदी 1986

दोस्तों आज हम चेरनोबिल परमाणु संयंत्र त्रासदी 1986 के बारे में चर्चा करेंगे। जोकि अक्सर प्रतियोगिता परीक्षाओं में पूछे जाते है। चेरनोबिल परमाणु संयंत्र त्रासदी 1986 का विवरण कुछ इस प्रकार है। 

यूक्रेन के चेरनोबिल में हुई परमाणु दुर्घटना को दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हादसा माना जाता है। तथा 26 अप्रैल 1986 के उस एक घंटे पर जिसमे एक टरबाइन टेस्ट होना था। लेकिन हुआ कुछ और ही। अर्थात एक साधारण टेस्ट बना दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हादसा। 

चेरनोबिल परमाणु हादसा कैसे हुआ

26 अप्रैल 1986 चेरनोबिल न्यूक्लियर प्लांट में स्थानीय बिजली के गुल होने की स्तिथि को लेकर टेस्ट किया जा रहा है। कोशिश यह थी की बिजली जाने और डीजल जेनरेटरों के चलने तक एक टर्बोजेनरेटर फीड वॉटर पम्पों को पावर दे सकता है। यह एक सामान्य टेस्ट की तरह रात में शुरू हुआ। रात 12 : 28 बजे ऑपरेटर कंप्यूटर को रिप्रोग्राम करने में नाकाम रहे। इसकी वजह से रिएक्टर - 4 30 फीसदी पावार पर चलता रहा। इसकी वजह से पैदा होने वाली बिजली में एक फीसदी कमी आई रिएक्टर में सॉलिड वाटर भर गया। तथा रिएक्टर की स्तिथि अस्थिर हो गई। 

रात 12 : 32 बजे - पावर को दोबारा मनचाहे स्तर पर लाने के लिए ऑपरेटर ने कोर से कंट्रोल रॉड्स निकाली कोर में 26 से कम कंट्रोल रॉड्स बची लेकिन ऐसा करने के बावजूद पावर सिर्फ सात फीसदी बढ़ी। इसकी वजह से जेनन पॉयजनिंग इफेक्ट शुरू हुआ। 

जेनन पॉयजनिंग जेनन I - 135 का क्षीण रूप है। तथा यह न्यूट्रॉन को सोखता है। इसे पॉयजन यानी जहर भी कहा जाता है। तथा यह I - 135 परमाणु विखंडन की प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करता है। व सामान्य स्तिथि में न्यूट्रॉन सोखने के साथ यह जलकर बहुत ज्यादा क्षीण हो जाता है। लेकिन पावर लेवल 1600 मेगावॉट से नीचे आने पर  I - 135 जेनन में अपघटित होने लगता है। 

रात 1 : 15 बजे - ऐसी स्तिथि में रिएक्टर को ऑटोमेटिक शटिंग डाउन से बचाने के लिए इमरजेंसी कोर कूलिंग सिस्टम और दूसरे सिस्टम सर्किट बंद कर दिए गए तथा जेनन पॉयजनिंग से बचने के लिए फिर ज्यादा कंट्रोल रोड्स निकाली गई। इसके बाद कोर में छह कंट्रोल रोड्स ही बची ऐसी स्तिथि में जरुरत पड़ने के बावजूद रिएक्टर को तुरंत शट डाउन नहीं किया जा सकता था। 

तथा रात्रि 1 : 20 बजे सभी आठ कूलिंग पम्प को पावर पर चलने लगी। अर्थात ठंडक कम पहुचने की वजह से प्रेशर ट्यूब खाली पड़ने लगी और परमाणु प्रतिक्रिया तेज होने लगी तथा अनियंत्रित ढंग से खूब भाप बनने लगी। रात्रि 1 : 24 बजे जबरजस्त गर्मी की वजह से कोर टूटने लगे ईंधन की बांधने वेक तंत्र में दरारे पड़ गई कंट्रोल रॉड चैनल्स का आकार गड़बड़ा गया। तथा लगातार बन रही तेजी से भाप की वजह से स्टीम ट्यूब फट गई। और कई टन भाप और पानी सीधे गर्म रिएक्टर में धुस गया।

परिणाम

अर्थात भाप के दबाव की वजह से रिएक्टर में जोरदार धमाका हुआ। धमाका इतना जबरदस्त था की रिएक्टर के ऊपर सीमेंट से बनाई गई शील्ड उड़ गई। तथा शील्ड रिएक्टर  की इमारत के छत को अपने साथ उड़ाते हुए ले गया। इस बड़े सुराख़ से परमाणु विकिरण सीधे वायुमंडल में फैलने लगा। अत: रात्रि 2 : 00 बजे रिएक्टर की छत में लगी भयंकर आग को काबू में करने की कोशिश की गई। व ज्यादातर आग पर काबू पा लिया गया। लेकिन इन कोशिशों के बावजूद ग्रेफाइट आग पकड़ गई। ग्रेफाइड की आग की वजह से रेडियोएक्टिव तत्व वातावरण में काफी ऊपर तक चले गए।

और इस तरह चेरनोबिल पॉवर प्लांट में शुरू हुआ एक टरबाइन टेस्ट 56 मिनट के भीतर दुनिया की सबसे बड़ी " परमाणु दुर्घटना " में बदल गया।

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