भारत का आर्थिक इतिहास (प्राचीनकाल, मध्यकाल व आधुनिक काल)
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| भारत का आर्थिक इतिहास (प्राचीनकाल, मध्यकाल व आधुनिक काल) |
दोस्तों आज हम इस लेख में, प्राचीन भारत के आर्थिक इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे। जोकि तीन भागों में विभक्त किया गया है। जिसमे प्राचीनकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल शामिल है। हमने आपको चरणबद्ध तरीके से भारत का आर्थिक इतिहास के बारे में, जानकारी देने का प्रयास किया है। जोकि परीक्षा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत का आर्थिक इतिहास
| भारत का आर्थिक इतिहास | प्राचीनकाल |
| मध्यकाल | |
| आधुनिक काल |
(A) प्राचीन काल
भारत का आर्थिक विकास का आरंभ सिंधु घाटी सभ्यता से माना जाता है। तथा सिंधु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था मुख्यत: व्यापार पर आधारित प्रतीत होती है। जो यातायात में प्रगति के आधार पर समझी जा सकती है।
- विशेषताएँ - अतिशेष अर्थव्यवस्था, बेहतर नगर नियोजन।
(2) ऋग्वैदिक काल
ऋग्वैदिक काल में कृषि एवं पशुपालन पर, अर्थव्यवस्था निर्भर थी। तथा ऋग्वैदिक काल में अर्थव्यवस्था काफी मजबूत व सुदृंढ थी।
- विशेषताएँ - ग्रामीण सभ्यता।
(3) मौर्य काल
मौर्यकाल ने भारतीय उपमहाद्वीप का एकीकरण किया। तथा राजनैतिक एकीकरण और सैन्य सुरक्षा से कृषि की उत्पादकता में वृद्धि के साथ व्यापार एवं वाणिज्य से सामान्य आर्थिक प्रणाली को बढ़ावा मिला।
(4) गुप्तकाल
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था भूमि पर आधारित थी। अत: कृषि ही आर्थिक विकास की आधारशिला थी।
(B) मध्यकालीन
अरब, तुर्क, मंगोल आदि विदेशी आक्रमणकारियों ने अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचाया फिर भी इस अवधि को भारत की प्राचीन एवं 17 वी शताब्दी तक की मध्ययुगीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में आंकलित किया जाता है।
(C) आधुनिक काल (1947)
यूरोपीय उपनिवेशवाद अर्थात अंग्रेजों के आगमन से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से गिरावट आई। तथा अंग्रेजों ने फुट डालो शासन करो की निति के आधार पर, अंग्रेजों ने पूरे देश में शासन करने के साथ किसानों का भी खूब शोषण किया। जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में तीव्र गति से गिरावट आई।
आर्थिक व्यवस्था के सम्बन्ध में किसने क्या कहा था?
रिटायर ICS, रोमेश चंद्र दत्त ने भारत का आर्थिक इतिहास लिखा था। 1757 के बाद आर्थिक कार्यकलापों की छानबीन J.V जोशी, पंडित सुब्रह्मण्यम, अय्यर, तथा गोपालकृष्ण गोखले आदि ने उपनिवेशिक आर्थिक नीतियों के दुष्प्रभावों की छानबीन की, तथा अंत निष्कर्ष निकाला गया की भारत के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा उपनिवेशवाद है। तथा भारत की हैसियत ब्रिटेन को खाद्य सामाग्री और कच्चे माल की आपूर्तिकर्ता की बना दी गई। और भारत ब्रिटिश पूंजी निवेश का बाजार बन गया था।
- जी. वी. जोशी - " उद्योगीकरण एक बेहतर और ऊँचे दरजे की सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है। "
- न्यायमूर्ति रानाडे के अनुसार - "स्कूलों और कॉलेजों के बजाय कारखाने कही ज्यादा प्रभावशाली ढंग से राष्ट्रिय गतिविधियों को जन्म दे सकते है। "
विदेशी पूंजी की भूमिका
आम सहमति थी की उद्योगीकरण भारतीय पूंजी पर आधारित होना चाहिए। विदेशी पूंजी पर नहीं।
- लार्ड कर्जन (1899 वायसराय) - "भारत के राष्ट्रिय विकास के लिए विदेशी पूंजी एक अनिवार्य शर्त है। "
- दादा भाई नौरोजी - "विदेशी पूंजी भारतीय संसाधनों की लूट और शोषण का जरिया है। "
- हिस्दुस्तान रिव्यू के संपादक - "लूटपाट के अंतर्राष्ट्रीय तंत्र है। "
राष्ट्रवादियों का तर्क
- यहाँ की पूंजी विदेश ले जाई जा रही और भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशी पकड़ मजबूत हो रही है।
अन्य आर्थिक समस्याएँ
भारत में परंपरागत दस्तकारी उद्योग तबाह हो गए थे। और सरकार भारतीय प्रगति के दावे व आंकड़े पेश कर रही थी। उनका कहना था की भारत का विदेशी व्यापार बढ़ रहा है व रेलों की शुरुआत भी की गई है। तथा इस पर भारतीयों का मत था की विदेशी व्यापार का भारतीय उद्योग व कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। तथा कच्चे माल का निर्यात व उत्पादित वस्तुओं का आयात हो रहा है। जिससे भारतीय अर्व्यवस्था पिछड़ रही है। तथा रेलवे को भारत के औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप नहीं रखा गया। जिस कारण औद्योगिक नहीं वाणिज्यिक क्रांति हुई। तथा औद्योगिक विकास में सबसे बड़ी बाधा मुक्त व्यापार निति थी।
- जी. वी जोशी - " रेलवे दरअसल ब्रिटिश उद्योगों के लिए भारत की तरफ, दी जाने वाली आर्थिक सहायता है। "
तथा भारत से संपत्ति विकास की बात सबसे पहले दादा भाई नौरोजी ने उठाई। तथा मई 1867 में दादा भाई नौरोजी ने कहा था की "ब्रिटेन भारत का खून चूस रहा है। " अर्थात एक सफल आंदोलन के लिए सिर्फ एक नारा था। - पूंजी निकास बंद करों। तथा भारतीय जनता के दिल -दिमांग में बैठे विश्वास की ब्रिटिश सरकार आम आदमी की माई बाप है। वही सबका भरणपोषण कर रही है। तब राष्ट्रवादी आर्थिक आंदोलन ने उखाड़ फेका और साबित किया की ब्रिटिश शासन का चरित्र लोक कल्याणकारी नहीं है। वह सिर्फ और सिर्फ भारतीयों का खून चूस रही है।
- दादा भाई नौरोजी - " जन कल्याण के नकाब के पीछे ब्रिटिश शासन लगातार इस देश का शोषण करता आ रहा है। यह शोषण इतने चुप - चाप ढंग से किया जा रहा है। की दुनिया को उसका पता ही न चल पाए। "
स्वशासन की मांग
राष्ट्रीय आन्दोलनों के पश्चात् हर आर्थिक मुद्दे को देश की गुलामी के साथ जोड़ा गया। तथा भारतीयों के दिल - दिमाग में यह बात बैठ चुकी थी की ब्रिटिश सरकार का प्रशासन महज शोषण का हथियार है। तथा 1875 से 1905 तक भारत में बौद्धिक अशांति का समय रहा और इसी समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के बीज बोए गए। और 1905 आते - आते स्वशासन की मांग उठनी शुरू हुई। तथा सबसे पहले दादा भाई नौरोजी ने अंर्तराष्ट्रीय सोशालिस्ट कांग्रेस (1904) के भाषण में भारत को स्वशासन और दूसरे ब्रिटिश उपनिवेशों की तरह का, दर्जा दिए जाने की मांग रखी। तथा 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी ने स्वशासन या स्वराज को राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य तय किया था।
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