France Ki Kranti In Hindi फ्रांस की क्रांति के कारण, प्रभाव और परिणाम

Rajkumar Yadav
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 फ्रांस की क्रांति (1789 ई0) व  फ्रांस की क्रांति के कारण, बौद्धिक कारण एवं विदेशी घटनाओं का प्रभाव और परिणाम

France Ki Kranti In Hindi फ्रांस की क्रांति के कारण, प्रभाव और परिणाम
फ्रांस की क्रांति (1789 ई0)

 फ्रांस की क्रांति :  फ्रांस की क्रांति की शुरुआत 18 वी शताब्दी में 1789 ई0 में हुई। तथा इस क्रांति का प्रभाव पूरे विश्व में व्यापक रूप से पड़ा। अर्थात फ्रांसीसी क्रांति में स्वतंत्रता, समानता, और बंधुत्व जैसी भावना का विकास हुआ। तथा इस क्रांति ने सम्पूर्ण विश्व के अन्य राष्ट्रों को भी प्रभावित किया इसलिए इसे विश्वरूपी क्रांति भी कहा जाता है। 

फ्रांसीसी क्रांति के कारण

हम अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से फ्रांस की क्रांति को तीन भागों में बाँट सकते है। जिनमे नीचे दिए गए पॉइंट प्रमुख है।

(A) राजनितिक कारण

  • निरंकुश राजशाही
  • राजदरबार की विलासिता
  • प्रशासनिक भ्रष्टाचार
  • अतिकेन्द्रीकृत प्रशासन
  • प्रशासनिक अव्यवस्था
  • न्याय व्यवस्था की दुर्बलता
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आभाव

(B) सामाजिक कारण

  • पादरी वर्ग
  • कुलीन वर्ग
  • कृषक वर्ग
  • मजदुर वर्ग
  • माध्यम वर्ग

(C) आर्थिक कारण

  • अव्यवस्तिथ अर्थव्यवस्था
  • दोषपूर्ण कर व्यवस्था
  • कर - वसूली के प्रणाली
  • व्यापारिक एवं व्यावसाहिक अवरोध
  • बेकारी की समस्या
  • सैनिक का असंतोष

(A) राजनितिक कारण

  • (1) निरंकुश राजशाही - यूरोप के अन्य देशों के समान फ़्रांस में भी निरंकुश राजतंत्र था। तथा राजा के हाथों में सारी शक्ति केंद्रित थी। तथा राजा अपने आप को ईश्वर का प्रतिनिधित्व मानता था। उसकी इक्षा ही कानून थी। फ़्रांस के बुर्बो वंश का सम्राट 'लुई चौदहवाँ दंभपूर्वक कहता था। "मै ही राज्य हूँ " तथा इस व्यवस्था में राजा की आज्ञा का उल्लंघन करना अपराध था। यदि वहाँ पर रह रहे लोग कभी राजा की बातों का उल्लंघन करते है। तो उन्हें दण्डित भी किया जाता था।
  • (2) राजदरबार की विलासिता - फ़्रांस का राजदरबार विलासिता का केंद्र था। तथा जनता से वसूला गया धन निर्ममतापूर्वक राजा अपने भोग - विलास और अमोद - प्रमोद पर खर्च करता था।
  • (3) प्रशासनिक भ्रष्टाचार - राजा के सलाहकार, सेवक और अधिकारी भ्रष्ट थे। तथा राजा के प्रमुख पदों पर योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पैरवी पर नियुक्ति की जाती थी। तथा पदाधिकारी एवं दरबारी एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए षड़यंत्र में लगे रहते थे। जिससे प्रशासन पर बुरा प्रभाव पड़ता था।
  • (4) अतिकेन्द्रीकृत प्रशासन - फ़्रांस की प्रशासनिक व्यवस्था की एक बड़ी दुर्बलता यह थी की प्रशासन की सारी शक्ति राजा के हाथों में केंद्रित थी। व इसकी इक्षा और सहमति के बिना कोई धर्म कार्य नहीं हो सकता था। और स्वायत्त प्रशासनिक संस्थाओं का प्रचलन भी नहीं था। 
  • (5) प्रशासनिक अव्यवस्था - फ़्रांस में प्रशासनिक एकरूपता का सर्वथा अभाव था। व वहां का प्रशासन अव्यवस्तिथ और बेढंग था। तथा विभिन्न प्रांतों, जिलों और अन्य प्रशासनिक इकाइयों में अलग - अलग कानून प्रचलित थे। और माप - तौल की प्रणाली न्याय व्यवस्था एवं कानून तथा मुद्रा के प्रचलन में भी एकरूपता का अभाव था।
  • (6) न्याय व्यवस्था की दुर्बलता - फ़्रांस की न्याय व्यवस्था में भी अनेक दुर्गुण विद्ध्यमान थे। तथा न्याय व्यवस्था अत्यंत महंगी थी। और छोटे - छोटे मुक़दमे में भी अत्यधिक धन खर्च होता था। व फ़्रांस की न्यायिक प्रक्रिया की सबसे विचित्र व्यवस्था थी की "राजाज्ञा या लेटर दी कैचे" से आशय है की किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध राजा लेटर भेज सकता था। फिर उस व्यक्ति को दण्डित किया जाता था। चाहे उस व्यक्ति ने अपराध किया हो अथवा नहीं। अत: यह भी फ़्रांस की क्रांति घटित होने का एक मुख्य कारण था। अर्थात राजा के लेटर के आधार पर किसी भी व्यक्ति पर बिना मुकदमा चलाए उसे गिरफ्तार किया जा सकता था तथा समान अपराध के लिए उच्च वर्ग को कम सजा परन्तु जन साधारण को कड़ी सजा दी जाती थी।
  • (7) व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आभाव - फ़्रांस की राजनितिक, प्रशासनिक व्यवस्था में व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कोई स्थान नहीं था। तथा राजा के विरुद्ध भाषणों अथवा लेखों के माध्यम से आवाज नहीं उठाई जा सकती थी। अत: भाषण, लेखन एवं प्रकाशन पर कठोर नियंत्रण था। ताकि इन सबके माध्यम से राजा के विरुद्ध कोई भी व्यक्ति आवाज न उठा सके। व राजा मुकदमा चलाए बिना भी किसी की भी गिरफ्तार कर दण्डित कर सकता था। तथा धार्मिक स्वतंत्रता भी नहीं थी और फ़्रांस का राजधर्म कैथोलिक धर्म था। इसलिए प्रोटेस्टेंट धर्मावलंबियों के लिए कड़े दंड की व्यवस्था की गई थी।

(B) सामाजिक कारण

  • (1) पादरी वर्ग - फ़्रांस में रोमन कैथोलिक चर्च की प्रधानता थी। व चर्च एक स्वतंत्र संस्था के रूप में काम कर रहा था। देश की भूमि का पांचवा भाग चर्च के पास था। और चर्च की वार्षिक आमदानी करीब तीन करोड़ रुपए थी। चर्च स्वयं करमुक्त था। तथा चर्च की अपार संपत्ति से बड़े बड़े पादरी भोग - विलास का जीवन बिताते थे। उन्हें धर्म के कार्यों से कोई मतलब नहीं था। वे पूर्णता सांसारिक जीवन व्यतीत करते थे।
  • (2) कुलीन वर्ग - फ्रांस का कुलीन वर्ग, सुविधायुक्त एवं संपन्न वर्ग था। व कुलीनों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। और वे राजकीय कर से मुक्त थे। राज्य धर्म, और सेना के उच्च पदों पर कुलीनों की नियुक्ति होती थी। वे किसानों से कर वसूल करते थे। तथा कुलीन के विशेषाधिकार और उत्पीड़न में साधारण लोगों को क्रन्तिकारी बनाया था। 
  • (3) कृषक वर्ग - किसानों का वर्ग सबसे अधिक शोषित और पीड़ित था। उन्हें कर का बोझ उठाना पड़ता था। व उन्हें राज्य चर्च और जमींदारों को अनेक प्रकार के कर देने पड़ते थे। तथा कृषक वर्ग अपनी दशा में सुधार लाना चाहते थे। और यह सुधार सिर्फ एक क्रांति के द्वारा ही संभव था। 
  • (4) मजदुर वर्ग - मजदूरों और कारीगरों की दशा अत्यंत दयनीय थी। तथा औद्योगिक क्रांति के कारण घरेलु उद्योग - धंधों का विनाश हो चूका था। जिससे मजदुर वर्ग बेरोजगार हो गए थे। और वह पेरिस भाग गए। तथा क्रांति के समय मजदुर वर्ग का एक बड़ा गिरोह तैयार हो चूका था।
  • (5) माध्यम वर्ग - माध्यम वर्ग के लोग सामाजिक असमानता को समाप्त करना चाहते थे। तथा तत्कालीन शासन के प्रति सबसे अधिक असंतोष माध्यम वर्ग में था। इसलिए क्रांति का संचालन और नेतृत्व की बागडोर इन्ही के हाथों में सौंपी गई। 

(C) आर्थिक कारण

  • (1) अव्यवस्तिथ अर्थव्यवस्था - फ्रांस की अर्थव्यवस्था अव्यवस्तिथ थी तथा राजकीय आय और राजा की व्यक्तिगत आय में कोई अंतर नहीं था। तथा किन स्त्रोतों से कितना धन आना है और किन - किन मदों में उन्हें खर्च करना है। निश्चित नहीं था। व निश्चित योजना के आभाव में ही फ़्रांस में आर्थिक तंगी आई थी। जो की फ़्रांस की क्रांति का एक महत्वपूर्ण कारण था। 
  • (2) दोषपूर्ण कर व्यवस्था - फ़्रांस की कर प्रणाली दोषपूर्ण थी। तथा समाज के प्रथम दो वर्ग करमुक्त थे। (A) कुलीन वर्ग (B) पादरी वर्ग। और कर का सारा बोझ तृतीय वर्ग विशेषत: किसानों पर था। और मजदुर वर्ग पर। कहा जाता है कि "फ़्रांस में पादरी पूजा करते है। कुलीन युद्ध करते है। और जनता कर देती है।" तथा ऐसी व्यवस्था में असंतोष होना स्वाभाविक था।
  • (3) कर - वसूली के प्रणाली - फ़्रांस में कर निश्चित नहीं थे। तथा कर वसूली का ठेका दिया जाता था। जिससे ठेकेदारों, किसानों और मजदूरों से अधिक से अधिक कर वसूलते थे। 
  • (4) व्यापारिक एवं व्यावसाहिक अवरोध - अव्यवस्तिथ अर्थव्यवस्था में व्यवसाय एवं वाणिज्य का विकास भी ठप पड़ गया और व्यवसायियों व व्यापारियों पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगे हुए थे। उन्हें प्रत्येक प्रान्त जिला शहर और स्थान से विभिन्न प्रकार के कर देने पड़ते थे। तथा इसका बुरा प्रभाव फ़्रांस की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। 
  • (5) बेकारी की समस्या - बेकारी की समस्या ने भी आर्थिक स्तिथि को दयनीय बना दिया। तथा औद्योगीकरण के कारण घरेलु उद्योग धंधे बंद हो गए। जिससे कार्यरत कारीगर और मजदुर बेकार अथवा बेरोजगार हो गए। और वे भी क्रांति के समर्थक बन गए। 
  • (6) सैनिक का असंतोष - फ़्रांस का सैनिक वर्ग, जिसमे अधिकांशत: किसान थे। वह भी तत्कालीन व्यवस्था से असंतुष्ट था। उन्हें नियमित वेतन नहीं मिलता था। तथा सैनिकों के भोजन वस्त्र का भी समुचित प्रबंध नहीं था। अर्थात सेना में पदोन्नति योग्यता के आधार पर नहीं दी जाती थी। वरन उच्च पदों पर सिर्फ कुलीन वर्ग के लोग ही नियुक्त होते थे। जिससे सेना असंतुष्ट थी।

बौद्धिक कारण

फ़्रांस की क्रांति में, फ़्रांस के बौद्धिक वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी। तथा फ़्रांस में अनेक दार्शनिक, विचारक और लेखक हुए। तथा जिन दार्शनिकों ने फ़्रांस के जनमानस को झकझोर दिया उनमे मॉन्टेस्क्यू, वाल्तेयर और रूसों का नाम उल्लेखनीय है। 

विदेशी घटनाओं का प्रभाव

फ़्रांस की क्रांति के पूर्व ही 1688 ईस्वी में इंग्लैंड में गौरवपूर्ण क्रांति हो चुकी थी। जिसका प्रभाव फ़्रांस पर भी पड़ा था। इसके परिणामस्वरूप इंग्लैंड में निरंकुश एवं स्वेक्षाचारी शासन समाप्त हुआ तथा जनता के नागरिक अधिकारों की सुरक्षा हुई। तथा फ़्रांस पर अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का भी व्यापक प्रभाव पड़ा। तथा इस स्वतंत्रता संग्राम में फ़्रांस के लोगों व सैनिकों ने भी भाग लिया। तथा इन घटनाओं ने 1789 की फ़्रांस की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

तात्कालिक कारण 

लुई सोलहवाँ की अयोग्यता

फ़्रांस में विषम परिस्तिथि होते हुए भी संभवता क्रांति नहीं होती। अगर शासन का बागडोर एक योग्य राजा के हाथों में होती। लुई सोलहवाँ मात्र 20 वर्ष की आयु में 1774 ईस्वी में गद्दी पर बैठा। उसमे प्रशासनिक अनुभव नहीं था। वह प्रशासन चलाने में असमर्थ था तथा उसका सारा समय भोग विलास में व्यतीत होता था। जो फ़्रांस की क्रांति का एक महत्वपूर्ण कारण रहा। 

फ्रांसीसी क्रांति के परिणाम

निरंकुश शासन का अंत कर प्रजातंत्रात्मक शासन -प्रणाली की नीव डाली गई। तथा प्रशासन के साथ - साथ सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। और क्रांति ने राजा के विशेषाधिकारों और दैवी अधिकार सिद्धांत पर आघात किया। तथा इस क्रांति के फलस्वरूप पूर्णता सामंती प्रथा का अंत हो गया और किसानों को सामंती कर से पूर्णता मुक्त कर दिया गया। तथा कुलीनों और पादरियों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए। और फ़्रांस की आर्थिक स्तिथि को सुधारने के लिए कर - प्रणाली में भी सुधार लाया गया। व न्यायालय का पुनर्गठन किया गया। तथा सरकार के द्वारा सार्वजानिक शिक्षा की व्यवस्था की गई। और फ़्रांस में एक प्रकार की शासन व्यवस्था भी स्थापित की गई। तथा लोगो को धार्मिक स्वतंत्रता मिली। 

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