लोक सभा और राज्य सभा का तुलनात्मक अध्ययन
![]() |
| तुलनात्मक अध्ययन |
यह लेख उन उम्मीदवारों के लिए बेहद उपयोगी है। जो विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है। आज हमने इस लेख में 'लोक सभा और राज्य सभा', एवं 'राष्ट्रपति और राज्यपाल' का तुलनात्मक अध्ययन के विषय पर चर्चा की है। जोकि अक्सर परीक्षाओं में, पूछे जाने की संभावनाएं बनी रहती है। हमारे द्वारा तुलनात्मक अध्ययन के लिए पूरा संक्षिप्त विवरण पॉइंटवार अथवा बिंदुवार प्रस्तुत किया गया है। ताकि समझने में आसानी रहे।
लोक सभा और राज्य सभा का तुलनात्मक अध्ययन
भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली को स्वीकारा जो राष्ट्रपति और लोकसभा एवं राज्य सभा से मिलकर बनती है। जो भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का आधार है। भारतीय संसदीय शासन प्रणाली में, लोक सभा एवं राज्य सभा भारतीय जन सम्प्रभुता एवं परिसंधात्मक ढांचे को अभिव्यक्त करने वाली दो महत्वपूर्ण संस्थाएं है। तथा दोनों ही संस्थाएं विधि निर्माण एवं निति निर्माण प्रक्रिया में विशिष्ट भूमिका निभाती है। जैसे -
- संविधान संशोधन विधेयक प्रक्रिया में दोनों को समान अधिकार प्राप्त है।
- तथा महाभियोग की प्रक्रिया में भी दोनों को समान अधिकार प्राप्त है।
- राज्य सभा स्थाई सदन है। जबकि लोकसभा अस्थाई सदन है।
- मंत्री परिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते है।
- व धन विधेयक के सम्बन्ध में लोकसभा शक्तिशाली होती है। जबकि राज्य सभा धन विधेयक को अस्वीकार नहीं कर सकती। तथा वित्तीय समितियां लोकसभा के सदस्यों से ही बनती है।
- संयुक्त बैठक के संबंध में लोकसभा, राज्य सभा की तुलना में ताकतवर होती है।
अत: लोकसभा और राज्य सभा एक - दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं है। अपितु एक - दूसरे के पूरक है। क्योकि
- जहाँ लोकसभा जन आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। वही राज्य सभा विशेषज्ञों का सदन है।
- जहाँ लोकसभा राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करता है वही राज्य सभा क्षेत्रीय हितों का। ऐसे में जो कानून बनते है। उसमे क्षेत्रीय हितों में बेहतर ढंग से समायोजित किया जाता है।
- जहाँ लोकसभा बहुमत का प्रतिनिधित्व करती है। वही राज्य सभा विभिन्न वर्गों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करती है।
राष्ट्रपति और राज्यपाल का तुलनात्मक अध्ययन
लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था को अपनाते हुए भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होते है। जो क्रमशः केंद्र और राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रमुख भी होते है। इनका तुलनात्मक अध्ययन इस प्रकार से किया जा सकता है -
(1) संवैधानिक प्रावधान: राष्ट्रपति के संबंध में विस्तृत प्रावधान संविधान के भाग 5 में A - 52 - 61 में किया गया है। जबकि राज्यपाल के संबंध में प्रावधान भाग - 6 के A - 153 - 154 में है।
(2) पदचयन: राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष निर्वाचन से चुना जाता है। जिसमे संसद और सभी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते है। लेकिन राज्यपाल निर्वाचित न होकर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
(3) शपथ: राष्ट्रपति को शपथ सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उनकी अनुपस्तिथि में उपलब्ध वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है। जबकि राज्यपाल को शपथ राज्य के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।
(4) विवेकाधीन शक्तियां: राष्ट्रपति की तुलना में राजपाल की विवेकावीन शक्तियां अधिक विस्तृत है।
(5) आपातकालीन शक्तियां: राष्ट्रपति A - 352, 356 और 360 के आधार पर आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग कर सकता है। जबकि ऐसी कोई शक्तियां राज्यपाल को प्राप्त नहीं है। वह सिर्फ राष्ट्रपति को A - 356 के तहत सिफारिश कर सकता है।
(6) विधायी शक्तियां: राष्ट्रपति केंद्रीय विधानमंडल का अनिवार्य अंग है। वैसे ही राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अनिवार्य अंग है। तथा दोनों के हस्ताक्षर से कोई विधेयक कानून का रूप लेता है। अर्थात दोनों को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त होती है।
उपरोक्त वर्णन से ज्ञात होता है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख है। जबकि वास्तविक प्रमुख प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री होते है। वास्तव में भारत में संघीय शासन व्यवस्था को अपनाया गया है। अत: दोनों के बीच सम्बन्ध स्थापित करते हुए लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करनी चाहिए।

Do not post spam links in the comment box.