राज्य स्तर पर न्याय व्यवस्था, अधीनस्थ - न्यायालय एवं जनहित याचिका का संक्षिप्त विवरण
![]() |
| अधीनस्थ न्यायालय एवं जनहित याचिका |
न्यायपालिका का गठन पदसोपान के आधार पर किया गया है। जिसमे सर्वोच्च स्तर पर सुप्रीम कोर्ट तत्पश्चात उच्च न्यायालय का स्थान है। तथा उच्च न्यायालय के अधीन संपूर्ण देश में लगभग समान व्यवस्था बनाते हुए जिला न्यायालय बनाए गए है। जिन्हे अधीनस्थ न्यायालय कहते है।
संरचना
उच्च न्यायालय के अधीन प्रत्येक जिले में तीन प्रकार के न्यायालय बनाए गए है -
- दीवानी न्यायालय
- फौजदारी न्यायालय
- राजस्व न्यायालय
(1) दीवानी न्यायालय -
- जिला न्यायाधीश का न्यायालय
- सिविल जज का न्यायालय
- मुंसिफ का न्यायालय
- लघुवाद न्यायालय
(2) फौजदारी न्यायालय
- सेशन जज (सत्र न्यायालय)
- प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
- द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट
- तृतीय श्रेणी मजिस्ट्रेट
(3) राजस्व न्यायालय
- बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू
- कमिश्नर की अदालत
- कलेक्टर की अदालत
- तहसीलदार
- नयाब तहसीलदार अदालत
जिला न्यायाधीश जिले का सबसे बड़ा न्यायिक अधिकारी होता है। संविधान के अनुसार एक ही अधिकारी दीवानी और फौजदारी कानूनों के तहत कार्य कर सकता है। दूसरे शब्दों में जिला न्यायाधीश सत्र न्यायाधीश भी होता है। अत: जब वह दीवानी मामलों की सुनवाई करता है। तो उसे जिला न्यायाधीश कहते है। और जब वह फौजदारी मामलों की सुनवाई करता है। तो उसे सत्र न्यायाधीश कहा जाता है। तथा जिला न्यायाधीश उम्रकैद से लेकर मृत्युदंड तक दे सकता है। तथा सबसे निचले स्तर पर दीवानी मामलों में मुंसिफ न्यायाधीश का न्यायालय जबकि फौजदारी मामलों में सत्र न्यायाधीश का न्यायालय होता है।
राजस्व न्यायालय
भू - राजस्व सरकार की आय का मुख्य स्त्रोत है। जिसके शीर्ष पर राजस्व बोर्ड होता है। राजस्व बोर्ड के अधीन आयुक्त का न्यायालय कलेक्टर का न्यायालय, तहसीलदार, नायब तहसीलदार के न्यायालय स्तिथ होते है। प्रत्येक जिले में भू - राजस्व संबंधी पृथक न्यायालीन व्यवस्था होती है। भू - राजस्व संबंधी मामला सर्वप्रथम तहसीलदार के न्यायालय में प्रस्तुत किया जाता है। इस न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध जिलाधीश के न्यायालय में अपील की जा सकती है। तथा संतुष्टि न मिलने पर इसके विरुद्ध कमिश्नर के न्यायालय में सुनवाई की जा सकती है। फिर भी संतुष्टि प्राप्त न हो तो अधीनस्थ न्यायालयों के शीर्ष पर राजस्व बोर्ड में अपील की जा सकती है।
अधीनस्थ न्यायालय
A - 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालय के गठन एवं कार्यपालिका तथा स्वतंत्रता का वर्णन है। तथा ये राज्य न्यायपालिका का निम्न न्यायालय होता है। क्योकि ये न्यायालय उच्च न्यायालय के लिए अधीन होते है।
जिला न्यायाधीश व सत्र न्यायाधीश
जब जिला न्यायाधीश दीवानी मामलों की सुनवाई करता है तो वह जिला न्यायाधीश कहलाता है। और जब फौजदारी मामलों की सुनवाई करता है तो वह सत्र न्यायाधीश कहलाता है। तथा जिले का सर्वोच्च न्यायालय, जिला न्यायाधीश का न्यायालय होता है।
जिला न्यायाधीश की नियुक्ति
A - 233 के अनुसार जिला न्यायाधीश की नियुक्ति स्थानांतरण व पदोन्नति का कार्य राज्यपाल, उच्च न्यायालय के परामर्श से करता है। तथा A - 234 के अनुसार जिला न्यायाधीशों के अतिरिक्त राज्य के न्यायिक सेवा में नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग व उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्यपाल करता है। किन्तु नियुक्ति के लिए व्यक्ति का कम से कम 3 वर्ष का वकालत का अनुभव अनिवार्य है।
प्रशासनिक अधिकरण
उद्देश्य - कम खर्च में शीघ्र न्याय
स्थापना - A - 323 (क) के तहत संसद विधि द्वारा संघ या किसी राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी निगम या प्राधिकारी से संबंधित लोक सेवाओं व पदों की भर्ती व अन्य सेवा शर्तों के विवादों के निपटारे हेतु इस अधिकरण की स्थापना की गई। व A - 323 (ख) के तहत राज्य सरकार को भी यह अधिकार प्रदान किया गया है। तथा केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना 1 नवम्बर 1985 में गई है। व इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। तथा कुल 16 शाखाएं अन्य उच्चतम न्यायालयों से संबंधित है।
ग्राम न्यायालय
भारत की अधिसंख्यक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। इसी को ध्यान में रखते हुए न्यायिक समावेशन एवं न्यायिक विकेन्द्रीकरण की अवधारणा को साकार करने के लिए ग्राम न्यायालय की स्थापना की जा रही है।
- स्थापना - ग्रामीण न्यायालय अधिनियम 2008 के प्रावधानों के अंतर्गत 2 अक्टुम्बर 2009 को ग्राम न्यायालय की स्थापना की गई।
- उद्देश्य - ग्रामीण जनता को दरवाजे पर सस्ता, सहज व सुलभ न्याय उपलब्ध करवाना इस न्यायालय का प्रमुख उद्देश्य है।
- संरचना - ग्राम न्यायालय को प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय बनाया गया है। जिसके पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति उच्च न्यायालय के परामर्श पर राज्य सरकार द्वारा की जाती है। तथा इसके न्यायाधीश को न्यायाधिकारी कहा जाता है। और वेतन और शक्तियां प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के समान ही रखी गई है। तथा ग्रामीण न्यायालय सचल न्यायालय होता है।
अधिकारिता
ग्राम न्यायालय में कम गंभीर प्रकृति से संबंधित सिविल और आपराधिक मामलों की सुनवाई की जाती है। अर्थात ऐसे मामलें जिनमे अधिकतम 2 वर्षों की सजा का प्रावधान हो। तथा ग्राम न्यायालय के फैसलों के खिलाफ जिला न्यायालयों में अपील की जा सकती है।
ग्राम न्यायालय यढ्पि प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में व्याप्त थे। जिसमे पंचायत के मुखियां द्वारा सामाजिक विधानों के आधार पर न्याय का कार्य किया जाता था। तथा ब्रिटिश शासन के दौरान यह व्यवस्था नष्ट कर दी गई। जिसे वर्तमान में वैधानिक बनाकर, ग्रामीण न्याय की दिशा में किया गया एक सराहनीय काम है।
जनहित याचिका
भारतीय लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली का उद्देश्य लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा साकार करना है। जिसमे प्रत्येक नागरिक को सहज और सुलभ न्याय मिल सके। लेकिन न्यायिक प्रणाली में अनेक जटिलताओं के कारण अनेक अवसरों पर पीड़ित व्यक्तियों को न्याय से वंचित रहना पड़ता है। अत: ऐसे ही अनेक समस्याओं के निराकरण का एक माध्यम है जनहित याचिका।
- संवैधानिक प्रावधान - संविधान का A -39 (A) में कहा गया है की राज्य के द्वारा गरीबों और पिछड़ों को निःशुल्क क़ानूनी सहायता उपलब्ध करायी जाएगी।
प्रावधान - सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पी0एन भगवती ने जनहित याचिका के संबंध में कहा था की कोई भी व्यक्ति जिसके साथ अन्याय हुआ है। वह एक साधारण पोस्ट कार्ड पर अपनी व्यथा सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट को लिख सकता है। उसे माननीय न्यायालय अपनी सुनवाई में लेगा और दिशा निर्देश जारी करेगा। जनहित याचिका में अधिक से अधिक लोगों का हित सम्बंधित हो। कोई भी अन्य व्यक्ति या संस्था इसका उपयोग कर सकता है। लेकिन इसके अंतर्गत व्यक्तिगत मामले नहीं रखे जा सकते।
महत्व
जनहित याचिका के महत्व को निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है -
- अनेक आकस्मिक और अनसुलझे विवादों पर महत्वपूर्ण निर्णय पारित हुए।
- गरीब और पिछड़ों तक न्याय की उपलब्धता बढ़ी है।
- पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने सम्बन्धी अनेक कानूनों का निर्माण और क्रियान्वयन हुआ।
- प्रदुषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रतिबन्ध लगाया गया और इस सम्बन्ध में नवीन मानक बनाए गए।
- बंधुआ मजदूरी, वेश्यावृति जैसी समस्याओं से ग्रषित अनेक वर्गों को राहत मिली।
- विधायिका और कार्यपालिका की निरंकुश और उपेक्षापूर्ण व्यवहार में भी कमी आई है।
आलोचना
- जनहित याचिकाओं का स्वार्थ हित में प्रयोग होने लगा है।
- अनावश्यक मुद्दों को जनहित का बताकर, प्रचार - प्रसार पाने का साधन हो गया है।
- न्यायपालिका पहले ही अपने कार्यों के बोझ से ग्रषित थी जिस पर जनहित याचिका ने और अधिक कार्यभार बढ़ा दिया।
- जनहित याचिका और न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका पर अपनी सीमा के उलंघन के भी आरोप लगे है।
जनहित याचिका का उद्देश्य
इसमें सर्वाधिक हितों के लिए मुक़दमे का प्रावधान है। सबसे पहले इसका जन्म अमेरिका में हुआ जहाँ इसे " सार्वजानिक कार्यवाही याचिका " कहा जाता है। भारत में इसका जन्म 1979 में न्यायाधीश कृष्णा अय्यर व न्यायाधीश पी0एन0 भगवती के अथक प्रयासों से हुआ। तथा किसी भी नागरिक या स्वयं न्यायालय द्वारा भी याचिका दायर की जा सकती है। यह लोकहित पर कार्य करती है। तथा इसका उद्देश्य तीव्र व सस्ता न्याय आम आदमी को उपलब्ध कराना है। व इसके उदेश्य निम्नलिखित है -
जैसे - कारगार क्षेत्र, कारागार व बंदी, बाल श्रम, सशस्त्र सेना, बंधुआ मजदूरी, पर्यावरण संसाधन, शहरी विकास, ग्राहक मामले आदि।
महत्वपूर्ण
लोक लेखा समिति में राजयसभा के 7 सदस्य होते है। भारत की आकस्मिक निधि A - 267 के अंतर्गत वर्णित है। तथा सदन के एक सत्र की समाप्ति सत्रावसान कहलाती है।
गणपूर्ति या कोरम
गणपूर्ति या कोरम से आशय न्यूनतम सदस्य संख्या जिसकी उपस्तिथि में सदन चलाया जा सके। उसे गणपूर्ति या कोरम कहा जाता है।
सुझाव
भारतीय न्याय व्यवस्था अधिक जटिल और महंगी है। उसमे जनहित याचिका लोकहित में वरदान सिद्ध हुई है। तथा इसकी कमियों को दूर करके इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। प्रसिद्धि और प्रचार - पाने वाली याचिकाएं अस्वीकृत करने के साथ - साथ दायर करने वालों पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। तथा न्यायाधीशों के लिए P.I.L की सुनवाई संबंधी एक अचार सहिता बनाई जाए। व कार्यपालिका और विधायिका से समन्वय करते हुए निर्णय दिए जाए। साथ ही सामान्य न्यायालयों की सक्रियता बड़ाई जाए।
निष्कर्ष
परंपरागत रूप से पीड़ित व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष, न्याय के लिए जाना पड़ता था। जो प्रक्रिया रूप में काफी जटिल और महंगी होने के साथ - साथ, धीरे - धीरे चलने वाली प्रक्रिया थी। लेकिन अब नवाचारों के रूप में न्यापालिका पोस्टकार्ड या अखबार की खबर के आधार पर संज्ञान लेकर पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने का कार्य करने लगी है। कुछ कमियों और आलोचनाओं के उपरांत भी यह व्यवस्था जारी रहने की आवश्यकता है।

Do not post spam links in the comment box.