मौर्य वंश (काल) एवं मोर्योत्तर काल का इतिहास
दोस्तों हमने इस लेख में मौर्य वंश और मोर्योत्तर काल दोनों को कवर किया है। ताकि आप इस वंश से सम्बंधित पूरा विवरण आसानी से प्राप्त कर सके। चलिए जानते है। मौर्य वंश और मोर्योत्तर काल के इतिहास के बारे में।
मौर्य वंश (काल) 323 - 298 बी. सी
चन्द्रगुप्त ने चाणक्य की सहायता से मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, लेकिन मौर्य वंशावली के संबंध में इतिहासकारों में मदभेद है। जैसे -
ब्राह्मण साहित्य में चन्द्रगुप्त को सूद्र जाति का तो वही बौद्ध तथा जैन ग्रंथों में चन्द्रगुप्त को क्षत्रिय कुल का बताया गया है। और मुद्राराक्षस (विशाखदत्त) ने चन्द्रगुप्त को वृषल जाति का बताया है। लेकिन अधिकतर इतिहासकारों ने इन्हे क्षत्रिय कुल का बताया है। प्लूटार्क ने बताया है की चन्द्रगुप्त ने अपनी 6 लाख सेना की सहायता से पुरे भारत को रोद डाला। तथा 321 बी सी में चन्द्रगुप्त ने सत्ता प्राप्त की और छोटे - छोटे राज्यों पर विजय प्राप्त करने के बाद चन्द्रगुप्त ने अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की।
305 बी सी में यूनान का शासक सिकंदर का उत्तराधिकारी सेल्यूकस निकेटर ने भारत पर आक्रमण किया। लेकिन चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस निकेटर को बुरी तरह से परास्त कर दिया। लेकिन बाद में चाणक्य की निति से चन्द्रगुप्त व सेल्यूकस में संधि हो गई। और सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलना का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया। तथा चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार स्वरूप प्रदान किया। सेल्यूकस का दूत मेगस्थनीज था तथा मगध में जब 12 साल तक अकाल पड़ा तब चन्द्रगुप्त ने 299 से 298 बी सी में अपने पुत्र बिन्दुसार के पक्ष में अपनी सत्ता त्याग दी और भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा प्राप्त करने के बाद श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चले गए। जहाँ उसे निर्वाण की प्राप्ति हुई। और मगध में बिन्दुसार का शासन प्रारंभ हुआ।
तथा स्ट्रेबो के अनुसार चन्द्रगुप्त ने पालिब्रोथस (पाटलीपुत्रक) उपनाम धारण किया था।
चन्द्रगुप्त मौर्य पुत्र बिन्दुसार 298 से 272 बी सी
बिन्दुसार ने सत्ता प्राप्त करने के बाद राधागुप्त व खल्टोक को पुरोहित का पद प्रदान किया। और इसी बीच बिन्दुसार ने अजीवक संप्रदाय की सदस्य्ता ग्रहण कर ली और इसके बाद बिन्दुसार ने किसी भी राज्य के साथ युद्ध नहीं किया। और विदेशी राज्यों के साथ मित्रतापूर्वक संबंध किए। तथा बिन्दुसार के शासनकाल में ही तक्षशिला में विद्रोह हुआ था। तब बिन्दुसार का बड़ा बेटा सुशीम विद्रोह का दमन करने में असफल रहा। तब बिन्दुसार ने अपने दूसरे पुत्र अशोक को भेजा।
अशोक ने जनता की समस्याओं को जानकर यहाँ के अधिकारीयों का स्थानांतरण उज्जैन कर दिया और उज्जैन के अधिकारीयों का स्थानांतरण तक्षशिला कर दिया। (भारत इतिहास में पहली स्थानांतरण की जानकारी प्राप्त होती है।) विद्रोह का दमन करने के बाद अशोक उज्जैनी की ओर जा रहा था। तभी विदिशा के सेठ की पुत्री महादेवी के साथ उसने विवाह कर लिया। लेकिन उज्जैन पहुँचते ही उसे अपने पिता की मृत्यु की जानकारी मिली और अशोक पाटलीपुत्र पहुचकर अपने 99 भाइयों की हत्या करके 269 बी सी में गद्दी पर बैठ गया। तथा अभिश्रोचेटक / अमित्रघात - यूनानी योग बिन्दुसार को कहते है।
बिन्दुसार पुत्र अशोक 273 से 232 बी सी
प्रिय दर्शी अशोक अपने 99 भाइयों की हत्या करने के बाद गद्दी पर बैठा था। तथा 232 बी सी में अशोक के पुत्रों ने जिसमे कुणाल (धर्म विवर्धन) ने अशोक को कारागार में डाल दिया और सत्ता प्राप्त की। लेकिन अशोक के बाद इस वंश का पतन होना प्रारंभ हो गया। और इस वंश का अंतिम शासक वृहद्र था। जिसकी हत्या उसके "सेनापति पुष्यमित्र शुंग" द्वारा कर दी गयी। तथा अशोक के धर्म का व्यापक लक्ष्य था समाज को सुव्यवस्तिथ बनाए रखना। और पुराणों में अशोक को अशोक वर्धन कहा गया है।
मोर्योत्तर काल
शुंग वंश 185 से 73 बी सी
शुंग द्वारा मौर्य वंश की हत्या करने के बाद मगध में 185 बी सी में शुंग वंश की स्थापना की गयी। शुंग ब्राम्हण धर्म का था। और उज्जैन में निवास करता था। जिसे वृहद्र ने शुंग की योग्यता के आधार पर अपना सेनापति बनाया था। पुष्यमित्र शुंग के संबंध में बौद्ध ग्रंथों का कहना है। की इसने साँची के स्तूपों की रेलिंग बनवाई तो वही इसने 84000 स्तूपों को नष्ट किया। पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में यूनानी शासक डेमोट्रियास का भारत पर आक्रमण हुआ था। लेकिन अस्वस्थ्य के कारण शुंग उनका दमन करने नहीं जा सका।तथा उसने अपने पुत्र अग्निमित्र शुंग को भेजा। फिर अग्निमित्र शुंग ने यूनानी शासक डेमोट्रियास का दमन किया। तथा पुष्यमित्र शुंग के पश्चात् अग्निमित्र शुंग गद्दी पर बैठा जिसने विदिशा को अपनी द्वितीय राजधानी के रूप में स्थापित किया।
गुप्तकाल का प्रारंभ
मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद गुप्तों ने भारतीय प्रशासन को एक सूत्र में बांधा। तथा गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त था। जो कुषाणों के यहाँ पर एक सामंत के रूप में कार्य करता था। इसके बाद गद्दी पर घटटोकस गद्दी पर बैठा जिसने कोशांबी को राजधानी बनाकर शासन करना प्रारंभ किया। तथा घटटोकस के पश्चात् इसका पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम गद्दी पर बैठा।
घटटोकस पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम 319 से 335 A . D
चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 से 20 A.D में अपना राजयभिषेक करवाया और गुप्त संवत की शुरुआत की। तथा चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्तकाल का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। तथा चीनी स्त्रोतों में श्रीगुप्त को चेलिकोती कहा जाता है। और मृगाशिरवावन में एक बौद्ध मंदिर बनवाने का श्रेय भी है। तथा चन्द्रगुप्त ने अपनी स्तिथि को मजबूत करने के लिए लिच्छवीगढ की राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह किया और राजा - रानी के सिक्के चलवाये और चन्द्रगुप्त ने अपनी मृत्यु से पहले अपने पुत्र समुद्रगुप्त को उत्तराधिकारी घोषित किया। तथा कुमारगुप्त समुद्रगुप्त को कॉंच के नाम से भी जाना जाता है। और कौशबी की राजधानी पाटलीपुत्र को माना जाता है।
समुद्रगुप्त ने वसुबंधु बौद्ध भिक्षु से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। तथा श्रीलंका के शासक मेघवर्धन ने समुद्रगुप्त से बौद्ध मठ बनवाने के लिए जमीन मांगी थी। जिसे समुद्रगुप्त ने दान कर दी। समुद्रगुप्त एक अच्छा वीणावादक था जिसके कारण इसे कविराज की उपाधि प्रदान की गयी थी। तथा समुद्रगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय गद्दी पर बैठा।
चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य
समुद्रगुप्त के बाद गुप्त वंशावली में चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम उल्लेखित है। चन्द्रगुप्त के बड़े भाई रामगुप्त के शासनकाल में शकों का आक्रमण हुआ था। शकों ने धुरवस्वामिनी को देने की शर्त पर, समुद्रगुप्त का शासन वापस करने की बात कही थी। और इसकी जानकारी रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त को प्राप्त हुई तो चन्द्रगुप्त ने, धुरवस्वामिनी का वेश बनाकर शक राजा के केम्प में गया और हत्या कर दी। और वहा से लौटकर अपने अपने भाई रामगुप्त को कारागार में डाल दिया। और धुरवस्वामिनी के साथ विवाह करके अपना राज्याभिषेक करवा लिया। इसी समय चीनी यात्री फ़राहयान 399 से 414 AD में भारत आया। तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य विद्वानों का संरक्षक था। उज्जैनी और पाटलीपुत्र विद्या के प्रमुख केंद्र थे। चन्द्रगुप्त के दरबार में 9 विद्वान निवास करते थे। तथा इनकी मडली को नवरत्न कहा गया, जो निम्न है।
- कालिदास
- धन्वंतरि
- वेतालभट्ट
- बराहमिहिर
- घटकर्पर
- बरूचि
- सपणा
- अमर्त्यसेन
- शंकु
चन्द्रगुप्त ने मेहरौली लौह स्तंभ (उज्जैन) का निर्माण करवाया। परन्तु इसको लेकर मतभिन्नता है। तथा 415 AD में चन्द्रगुप्त की मृत्यु हो गई और चन्द्रगुप्त की मृत्यु के बाद गद्दी पर कुमार गुप्त बैठा।
चन्द्रगुप्त द्वितीय पुत्र कुमार गुप्त
चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद गद्दी पर कुमारगुप्त बैठा लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है। की धुरवस्वामिनी का एक अन्य पुत्र गोविन्द गुप्त गद्दी पर बैठा।
लेकिन इतिहासकार मानते है। की कुमारगुप्त का नाम ही गोविन्दगुप्त है। कुमारगुप्त ने अपने शासनकाल में शांतिप्रिय निति अपनाई और अश्वमेघ यज्ञ किया। तथा इसके शासनकाल को अभिलेखों का काल भी कहा जाता है। और कुमारगुप्त सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख विलिषण अभिलेख है। जिसमे कुमारगुप्त की वंशावली प्राप्त होती है। तथा स्कंदगुप्त के भीतरी स्तम्भलेख से जानकारी प्राप्त होती है। की कुमारगुप्त के शासनकाल में "पुष्यमित्र नामक जनजातियों का विद्रोह हुआ था। लेकिन कुमारगुप्त के अस्वस्थ्य होने के कारण कुमारगुप्त ने अपने पुत्र स्कंदगुप्त को भेजा। स्कंदगुप्त ने जनजातियों के विद्रोह का दमन किया। परन्तु जब वह लौटकर आया तो उसने अपनी माता को विधवा के वेश में देखा। तथा वह अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् गद्दी पर बैठा। और कुमारगुप्त ने काल में ही नालंदा में बौद्ध विहार के लिए जमीन प्रदान की गयी थी। जो आगे चलकर "नालंदा विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध हुआ"।
कुमारगुप्त पुत्र स्कंदगुप्त 455 से 467 AD
स्कंदगुप्त ने पुष्यमित्र जाति के विद्रोह का दमन करने के बाद अपने राज्य में शांति स्थापित की। लेकिन स्कन्धगुप्त के शासनकाल में हूण जनजाति के आक्रमण का सामना करना पड़ा। तथा स्कंदगुप्त ने हूणों को बुरी तरह से पराजित किया इसकी जानकारी जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है। स्कंदगुप्त ने सौराष्ट्र के किसानों की स्तिथि को देखते हुए सौराष्ट्र के प्रान्तपति पर्णदत्त की सहायता से सुदर्शन झील का पुननिर्माण करवाया और इसकी जानकारी हमें जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है। तथा 461 AD में स्कन्दगुप्त की मृत्यु हुई। तथा स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद गुप्तकाल का पतन भी प्रारंभ हो गया। और इस वंश का अंतिम शासक कुमारगुप्त तृतीय रहा। तथा स्कंदगुप्त को कहोम स्तम्भलेख में "शक्रादित्य" कहा गया। इसी ने हूण जनजाति को एकत्रित कर आक्रमण करना प्रारंभ किया था।
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