रूस की क्रांति व रूस की क्रांति के कारण, परिणाम और महत्वपूर्ण योगदान विश्व को
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| रूस की क्रांति |
पूरब से पश्चिम की ओर विस्तृत विशालकाय देश, रूस विश्व के सकल स्थल भू - भाग का 1 / 6 भाग प्राप्त कर अपनी विस्तार आकृति के साथ, महाशक्ति बन गया था। तथा पड़ोसियों से तनाव उसकी विदेश निति में परिलक्षित होती रहती थी। अपनी सीमाओं की सुरक्षा, काला सागर में निर्बाध आवागमन, मानचित्र से मिटने वाले राज्यों की लूट में अपना यथेष्ट हिस्सा तथा मध्य एशिया में ब्रिटेन की महत्वकांक्षाओं पर रोक लगाना, पूर्वी एशिया में जापानी साम्राज्य विस्तार को रोकते हुए। अपना प्रभुत्व कायम रखना रूस की एक विदेश निति थी।
क्रांति से पूर्व रूस की स्तिथि
जापान से 1904 - 05 ईस्वी के युद्ध में पराजित होकर रूस की मिथकीय श्रेष्ठता छिन्न - भिन्न हो गई। तथा एशियाई बोने ने यूरोपीय दैत्य को पटखनी देकर न केवल उस की विदेश निति, आर्थिक घरेलु, राजनितिक को प्रभावित किया बल्कि उसकी श्रेष्ठता के तिलिस्म को भी तोड़ दिया इस पराजय ने रुसी जार की दुर्बलता को उजागर कर दिया।
रुसी क्रांति के कारण
(1) जारशाही की निरंकुशता - रूस के सम्राट अत्यधिक निरंकुश थे। वे अपने को किसी के प्रति उत्तरदाई नहीं समझते थे।
(2) 1905 की क्रांति तथा ड्यूमा के प्रभाव को कुचलने का प्रयास - वर्ष 1904 - 05 में रूस जापान युद्ध हुआ। इस युद्ध में रूस की छोटे से जापान के हाथों पराजय हुई। तथा 22 जनवरी 1905 को रविवार के दिन लगभग डेढ़ लाख मजदूरों ने पादरी गैपों के नेतृत्व में जार के समक्ष अपनी राजनीति को औद्योगिक मांगों को मनवाने के लिए प्रदर्शन किया।
(3) कृषकों की दयनीय दशा - रूस एक कृषि प्रदान देश था। वहां कृषकों की स्तिथि अत्यंत दयनीय थी। तथा जार अलेक्जेंडर द्वितीय द्वारा 1861 ईस्वी में कृषि दासों की मुक्ति की घटना के उपरांत भी कृषकों की स्तिथि में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ।
(4) श्रमिकों का असंतोष - यद्यपि इस समय रूस एक कृषि प्रधान देश था। फिर भी औद्योगिक क्रांति का प्रभाव वहां दिखाई देने लगा। तथा एलेग्जेंडर तृतीय के समय में औद्योगीकरण की गति में परिवर्तन हुआ जिससे हजारों की संख्या में, भूमिहीन कृषक इन उद्योग केंद्रों पर रोजगार के लिए पहुँचने लगे।
(5) आर्थिक एवं सामाजिक विषमता - इस समय रूस की सामजिक स्तिथि वैसी ही थी। जैसी 1789 ईस्वी से पूर्व फ़्रांस की थी। तथा समस्त रुसी समाज दो भागों में विभक्त किया जा सकता था। प्रथम अधिकार युक्त जार की कृपा प्राप्त कुलीन लोग थे। यह लोग जार की निरंकुशता एवं स्वेक्षाचारिता को आवश्यक समझते थे। और दूसरा वर्ग अधिकारहीन वर्ग था। जिसमे किसान तथा मजदुर आते थे।
(6) जार की रुसी करण की निति - रूस की प्रजा विभिन्न जातियों के समिश्रण से बनी थी। वहां कई धर्म प्रचलित थे। और कई भाषाएं थी। तथा रूस की जनता में यहूदी, पौल, फिन, अजबेग, तातार, कजाक, आर्मीनियम, रुसी आदि का समावेश था। इन सब की अपनी - अपनी संस्कृति और सभ्यता थी। तथा रुसी इन सब में प्रभावशाली होने के कारण शासक बन गए थे। इनकों अन्य अल्पसंख्यक जातियों के साथ कोई हमदर्दी नहीं थी। तथा इन अल्पसंख्यक जातियों का विरोध निकोलस द्वितीय के समय से ही रुसीकरण की निति अपनाई गई और "एक जार एक धर्म" का नारा अपनाया गया। तथा आदि कारणों से रुसी क्रांति का आरंभ हो गया।
रुसी क्रांति के परिणाम
रुसी क्रांति के परिणामों को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से तीन भागों में बांटा गया है जिनमे -
(A) राजनीतिक परिणाम
- केरेंसकी सरकार का पतन
- प्रथम साम्यवादी सरकार की स्थापना
- रूस का युद्ध से पृथक होना
- मित्र राष्ट्रों का असंतोष और गृह युद्ध में हस्तक्षेप
- साम्यवादी व्यवस्था एवं विचारधारा का प्रसार
(B) सामाजिक परिणाम
- वर्ग भेद का वलोपन
- स्त्रियों की दशा में सुधार
- शिक्षा का विकास एवं बोल्शेविकरण
- नास्तिक विचारों को प्रोत्साहन
(C) आर्थिक परिणाम
- आर्थिक समानता की स्थापना
- रूस का औद्योगिक विकास
- श्रमिकों एवं कृषकों के जीवन स्तर में सुधार
(A) राजनीतिक परिणाम
(1) केरेंसकी सरकार का पतन - रूसियों ने 6 - 7 नवम्बर 1917 ईस्वी को केरेंस की सरकार का तख्ता बिना रक्त बहाए पलट दिया।
(2) प्रथम साम्यवादी सरकार की स्थापना - साम्यवादी सरकार की विश्व में पहली स्थापना हुई थी।
(3) रूस का युद्ध से पृथक होना - बोल्शेविक प्रारंभ से ही प्रथम विश्व युद्ध में, रूस के भाग लेने के विरोधी थे।
(4) मित्र राष्ट्रों का असंतोष और गृह युद्ध में हस्तक्षेप - रूस ने अपने मित्रों से परामर्श किए बिना ही जर्मनी के साथ संधि कर ली। तो मित्र राष्ट्र असंतुष्ट हो गए।
(5) साम्यवादी व्यवस्था एवं विचारधारा का प्रसार - साम्यवाद, राष्ट्र राज्य या देश की परिधि को स्वीकार नहीं करता, बोल्शेविक क्रांति को भी उन्होंने रूस की चार दीवारी में कैद रखना उपर्युक्त नहीं समझा।
(B) सामाजिक परिणाम
(1) वर्ग भेद का वलोपन - रूस में कुलीन और सर्वहारा वर्ग में जो भेद था। क्रांति ने उसे मिटा दिया।
(2) स्त्रियों की दशा में सुधार - रुसी क्रांति ने लिंग आधारित भेदभाव को भी नष्ट कर दिया।
(3) शिक्षा का विकास एवं बोल्शेविकरण - शिक्षा पर चर्च का शिकंजा उठ गया और शिक्षा सार्वजानिक हो गई।
(4) नास्तिक विचारों को प्रोत्साहन - रूस के लोग धर्म को अफीम मानते थे। अत: रुसी क्रांति के बाद वह नास्तिक विचारधारा का योजना पूर्वक विकास किया गया।
(C) आर्थिक परिणाम
(1) आर्थिक समानता की स्थापना - क्रांति से पूर्व जो आर्थिक विषमता थी उसे समाप्त कर दिया गया।
(2) रूस का औद्योगिक विकास - रूस में औद्योगिक उत्पादन की दृष्टि से अत्यधिक विकास हुआ।
(3) श्रमिकों एवं कृषकों के जीवन स्तर में सुधार - भूमिहीन किसानों और कामगारों का युद्ध पूर्व जीवन काफी कष्ट में था। लेकिन युद्ध ने इन के स्तर को बढ़ा दिया।
महत्वपूर्ण योगदान विश्व को
रुसी पंचांग
1917 ईस्वी की क्रांति तक रूस में 2 कैलेंडर प्रचलित थे। जूलियन पद्धति और ग्रेगोरियन पद्धति इन दोनों कैलेंडर में 13 दिन का अंतर था। जूलियन में 13 दिन ज्यादा थे। व ग्रेगोरियन में 13 दिन कम थे। लेकिन इस क्रांति के पश्चात् ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित हो गया। और इसमें 13 दिन बढ़ा दिए गए। तथा रुसी क्रांति को बोल्शेविक KRANTI भी कहा जाता है। क्योकि यह रुसी क्रांति से ही बनी थी। अर्थात इसे अक्टूम्बर क्रांति के नाम से भी जाना जाता है।

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