मृदा अपरदन क्या है? मृदा का निम्नीकरण एवं मृदा अपरदन के उपाय (मृदा संरक्षण)
मध्यप्रदेश में मृदा अपरदन कृषि के लिए एक जटिल समस्या है। क्योकि इसके कारण मिट्टी की सतह से मिट्टी के विहीन कण कट - कटकर बह जाते है। जिसके कारण उस क्षेत्र की उर्वरता और उत्पादन में कमी आती है। तथा मानसूनी वर्षा मृदा - अपरदन का एक मुख्य कारण है। व तेज वर्षा भी मृदा अपरदन को बढ़ावा देती है। जो फसलों के लिए हानिकारक होता है। मध्यप्रदेश में अधिकतर भूमि पठारी एवं पहाड़ी है तथा ढाल पर्याप्त है। अत: मानसूनी वर्षा तथा भूमि के गलत उपयोग के कारण मृदा अपरदन एक जटिल समस्या बन गई है। यदि इसे रोकने के कारगर उपाय तुरंत नहीं अपनाए गए तो निकट भविष्य में यह एक गंभीर समस्या हो जाएगी।
मृदा का निम्नीकरण (मृदा का ह्रास)
प्राकृतिक व मानवीय गतिविधियों द्वारा मृदा का विनाश, नित नई कीटनाशक दवाईयों का प्रयोग, तथा एक जगह की खेती को छोड़कर, दूसरे स्थान पर खेती करना भी इसका प्रमुख कारण हो सकता है। जिससे मिट्टी की उर्वरता में काफी कमी आ जाती है और मिट्टी उपजाऊ नहीं रहती।
मृदा अपरदन के उपाय (मृदा संरक्षण)
मृदा को हम निम्न तरीके से सुरक्षित रख रखते है। यथा हमें आधिकारिक वृक्षा रोपण किया जाना चाहिए। तथा खेतों में मेड़ों का निर्माण भी करना चाहिए। जो जल के प्रवाह को कम कर सकते है। साथ ही हमें फसल चक्र का भी प्रयोग करना चाहिए। जिससे मृदा तथा फसलों को नुकसान न पहुचने पाए। साथ ही अनियंत्रित वनों की कटाई पर रोक, स्थान्तरित कृषि पर रोक, तथा अनियंत्रित पशु चरण पर भी रोक लगाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। व पहाड़ी वाले क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत का प्रयोग कर मिट्टी को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा "SOIL HEALTH CARD SCHEME" की शुरआत 19 फ़रवरी 2015 को राजस्थान के सूरतगढ़ में की गई। जिसका मुख्य उद्देश्य उत्पादकता में सुधार व किसानों की स्तिथि को सुधारना था।
महत्वपूर्ण
मध्यप्रदेश में सर्वाधिक "काली मिट्टी" पाई जाती है। और मध्यप्रदेश में मुख्यत: 5 प्रकार की मिट्टी पाई जाती है। जो इस प्रकार है।
काली मिट्टी: काली मिट्टी का अन्य नाम रेगड़ मिट्टी है। तथा इस मिट्टी में लोहा तथा चूना सर्वाधिक होता है। यह मिट्टी क्षारीय प्रकृति की होती है। इस मिट्टी का PH मान 7.5 से 8.5 होता है। मध्यप्रदेश में यह मिट्टी 47 % भाग पर पाई जाती है। तथा मालवा, नर्मदा, सोनघाटी तथा सतपुड़ा में मेकाल श्रेणी में यह मिट्टी पाई जाती है। तथा काली मिट्टी तीन प्रकार की होती है।
- गहरी काली मिट्टी
- साधारण काली मिट्टी
- छिछली काली मिट्टी
लाल पिली मिट्टी: इसका रंग लाल लोहे के ऑक्सीकरण के कारण होता है। इस मिट्टी का पीला रंग फेरिक ऑक्साइड के कारण होता है। इस मिट्टी का PH मान 5.5 से 8.5 होता है। यह मिट्टी पूर्वी भाग बघेलखण्ड, मंडला, बालाघाट, शहडोल में पाई जाती है। तथा इस मिट्टी का 37 % भाग हमारे मध्यप्रदेश में पाया जाता है।
जलोढ़ मिट्टी: यह मिट्टी सर्वाधिक उपजाऊ होती है। यह मिट्टी मध्य भारत क्षेत्र में पाई जाती है। जिसमे भिंड, मुरैना, श्योपुर, ग्वालियर तथा शिवपुरी जिले आते है। यह एक उदासीन मिट्टी है। तथा यह मिट्टी गेहूँ, गन्ना, कपास के लिए अधिक उपर्युक्त होती है। अत: मध्यप्रदेश के 3 % भाग अर्थात 3 लाख एकड़ में यह मिट्टी पाई जाती है।
मिश्रित मिट्टी: इस प्रकार की मिट्टी में लाल, पिली तथा काली मिट्टी का समिश्रण पाया जाता है। यह मिट्टी बुंदेलखंड में पाई जाती है। तथा इसमें मोटे अनाज उगाए जाते है।
कछारी मिट्टी: बाढ़ के दौरान नदियों द्वारा अपने अप्रवाह क्षेत्र में बिछाई गई मिट्टी, कछारी मिट्टी कहलाती है। यह मिट्टी भिंड, मुरैना, श्योपुर, ग्वालियर में पाई जाती है। इस मिट्टी में गेहूँ, गन्ना, कपास आदि फसलें बोई जाती है।
मध्यप्रदेश में मृदा अपरदन
मध्यप्रदेश में सर्वाधिक मृदा अपरदन चंबल घाटी में होता है। यह "GULLY EROSION" (अवनालिका अपरदन) का विकराल रूप है। तथा यह कृषि हेतु अत्यधिक जटिल समस्या है। मध्यप्रदेश में चंबल नदी द्वारा सर्वाधिक मृदा अपरदन होता है। तथा मिट्टी का अपक्षरण "रेंगती हुई मृत्यु" कहलाता है।अर्थात मृदा अपरदन जल के अलावा वायु द्वारा भी होता है। और तेज जल धारा द्वारा मिट्टी को गहरा काटने को अवनालिका अपरदन कहा जाता है।
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