Jal Prabandhan Ke Uddeshya, Prayas Aur Watershed In Hindi

Rajkumar Yadav
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जल प्रबंधन क्या है ? प्रबंधन के उद्देश्य, प्रयास और वाटरशेड परियोजना

Jal Prabandhan Ke Uddeshya, Prayas Aur Watershed In Hindi
जल प्रबंधन

जल का जीवन से गहरा संबंध है। पृथ्वी पर उपलब्ध जल का जितना प्रयोग हो रहा है। उससे अधिक जल प्रदूषित हो रहा है। और व्यर्थ बहकर बर्बाद हो रहा है। इसलिए आज जल का उचित प्रबंधन जरुरी है।

वाटरशेड प्रबंधन (जल विभाजन)

वाटरशेड प्रबंधन योजना द्वारा ही भारत जैसे विशाल जनसँख्या वाले देश की जनता के लिए भविष्य की भोजन की मांग को पूरा किया जा सकेगा। तथा यह कार्यक्रम मनुष्य को जल के कारण उत्पन्न खतरों रोग और दोषपूर्ण जल पिने के दुष्प्रभाव से बचाता है। वाटरशेड कार्यक्रम द्वारा हरियाली और वन क्षेत्र को बढ़ाया जा सकता है। जो भविष्य के पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी आवश्यक है।

वाटरशेड (जलविभाजन) समिति

यह समिति ग्राम पंचायत की उपसमिति होगी तथा ग्राम सभा द्वारा इसका गठन किया जायेगा। यह सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1860 के अंतर्गत पंजीकृत होगा। तथा भारतीय संस्था पंजीकरण अधिनियम - 1860 भारत में ब्रिटिश राज के अंतर्गत अधिनियमित किया गया था। इस अधिनियम के अंतर्गत साहित्यिक, वैज्ञानिक, धर्मार्थ व कल्याणकारी संस्थाओं का पंजीकरण कराया या किया जा सकता है।
इस समिति के सचिव एवं अध्यक्ष का चयन ग्राम सभा करेगी। तथा वाटरशेड समिति का सचिव, पंचायत सचिव से पृथक स्वतंत्र कार्यकर्त्ता होगा। 

भारत में जल संसाधनों के प्रबंध हेतु निम्न प्रयास किए गए

  1. जल संसाधन प्रबंधन एवं प्रशिक्षण योजना - सन 1984 में भारत सरकार केंद्रीय जल आयोग ने सिंचाई अनुसंधान एवं प्रबंध संगठन की स्थापना की। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य सिचाईं प्रणालियों को सुधारना था। तथा सिचाई संस्थाओं को कुशल बनाना तथा अनुरक्षण करना इसका उद्देश्य था।
  2. राष्ट्रीय जल प्रबंधन परियोजना भारत सरकार ने सन 1986 में विश्व बैंक की सहायता से प्रारंभ की तथा इस परियोजना को भारत के कृषि क्षेत्र को विकसित करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया।
  3. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण - केंद्रीय जल आयोग ने राज्यों के प्रतिनिधियों को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का कार्यक्रम प्रारंभ किया।
  4. अधोभूमिक जल संसाधनों के लिए योजना - केंद्रीय जल आयोग ने भारत के उन क्षेत्रों में जहाँ अधोभूमिक जल के उपयोग के क्षेत्र में अधिक कार्य नहीं हुआ। उन क्षेत्रों के लिए यह योजना तैयार की।
  5. नवीन जल निति भारत सरकार ने 31 मार्च 2002 से नवीन जल निति लांगू की इसके अंतर्गत जल संरक्षण को एक मुख्य विषय के रूप में अगली पंचवर्षीय योजना में सम्मिलित किया गया है।

जल भरण (वाटरशेड) प्रबंधन के उद्देश्य

  1. वाटरशेड प्रबंधन द्वारा भूमि पर बहने वाले वर्षाजल को रोकने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। साथ ही कृषि उत्पादकता को भी बढ़ाया जा सकता है। 
  2. वाटरशेड प्रबंधन द्वारा वर्षाजल का संचयन करके जल पुनर्भरण का कार्य किया जा सकता है।
  3. तथा वाटरशेड प्रबंधन द्वारा वर्षाजल का संचयन करके हरियाली, वृक्ष, फसले, और घास उगाई जा सकती है।
  4. वाटरशेड प्रबंधन द्वारा ग्रामीण मानवशक्ति और जल ऊर्जा - प्रणाली को विकसित किया जा सकता है।
  5. वाटरशेड प्रबंधन द्वारा मानव समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्तिथि में सुधार किया जा सकता है।

वाटरशेड परियोजना

एकीकृत जल ग्रहण प्रबंधन (IWMP) एवं पूर्व संचालित सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) तथा मरुभूमि विकास कार्यक्रम (DDP) और समेकित वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP) नामक एक एकल संशोधित कार्यक्रम में एकीकृत किया गया है। जिसका उद्देश्य वर्षा का जल एवं भूमि संरक्षण तथा टिकाऊ रोजगार उपलब्ध करना था। विभाग - पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग इस कार्यक्रम के अंतर्गत विकास कार्यों पर 50 % उत्पादन प्रणाली पर 13 % गरीब परिवार की आजीविका पर 10 % एवं सामुदायिक सहभागिता पर 5 % राशि खर्च करने का प्रावधान है।

महत्वपूर्ण

जिला वाटरशेड विकाश को संक्षेप में DWDU बोला जाता है। जंगल, जल, जमींन एवं जानवर का प्रबंधन कार्यक्रम IWMP में होता है। तथा खेत की मिट्टी खेत में, गांव का पानी गांव में यह नारा IWMP कार्यक्रम से संबंधित है। राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण का गठन 2006 में हुआ था। तथा नवीन जल निति भारत सरकार ने 31 मार्च 2002 से लागूं की थी। व राष्ट्रीय जल प्रबंध परियोजना भारत सरकार ने सन 1986 में विश्व बैंक की सहायता से की थी। अर्थात प्रारंभ की थी। वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण का गठन 2006 में किया गया था। तथा हरियाली दिशा निर्देश अप्रैल 2003 ने प्रस्तुत किया गया था। एकीकृत जल प्रबंधन कार्यक्रम में केंद्र एवं राज्य का हिस्से का अनुपात 90 : 10 है। व जल ग्रहण समिति का गठन ग्राम सभा करती है। तथा एकीकृत जल ग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम 3 चरणों में पूर्ण किया जाता है। जल ग्रहण क्षेत्र कार्यक्रम में कार्यों का क्रियान्वयन पहाड़ी से घाटी अवधारणा पर किया जाता है।

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