भारत में भूमि सुधार व भूमि सुधार के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम
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| भारत में भूमि सुधार |
भारत में भूमि सुधार को दो चरणों में देखा जा सकता है। जिसमे स्वतंत्रता के पहले की स्तिथि और स्वतंत्रता के बाद की स्तिथि।
- स्वतंत्रता के पहले की स्तिथि: सभी अर्थव्यवस्थाएं कृषि पर आधारित थी।
- स्वतंत्रता के बाद की स्तिथि: सभी अर्थव्यवस्थाएं अपने प्राथमिक चालक शक्ति के रूप में आद्योगिकीकरण को चुना परन्तु सफता नहीं मिली। अत: पुन: अर्थव्यवस्था को उचित तरीके से चलाने के लिए PMF के रूप में कृषि को चुना गया। तथा अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए कृषि का प्रयोग किया गया तभी से अर्थात स्वतंत्रता के बाद से ही भूमि सुधार की आवश्यकता भी पड़ी। और भूमि सुधार के प्रथम चरण का शिलायन्स हुआ चूकि भारत के अंदर अधिकांश लोगो की आजीविका का मुख्य आधार कृषि ही था।
इसलिए 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस बात की घोषणा कर दी थी की स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भूमि सुधार लागू किए जायेगे।
भूमि सुधार करने के पीछे मुख्य तीन उद्देश्य निम्न थे।
1. कृषि उत्पादन को बंधित करने वाली संस्थागत विसंगतियों को दूर करना। जैसे जोत क्षेत्र के आकार, भूमि का स्वामित्व, भूमि उत्तराधिकार, काश्तकारी सुधार, मध्यस्थों की समाप्ति आदि।
2. चूकि देश में 80 % से अधिक लोगों की जीविका कृषि पर आधारित थी। तथा सामाजिक आर्थिक असमानता के चलते भूमि स्वामित्व में भी असमानता मिलती थी।
3. तथा प्रकृति से समसामयिकता स्थापित करके कुपोषण व खाद्यान की कमी को दूर किया जाना अन्य उद्देश्य था।
भूमि सुधारों के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा तीन कदम उठाए गए
- मध्यस्थों की समाप्ति
- काश्तकारी सुधार
- कृषि पुनर्गठन
1. मध्यस्थों की समाप्ति: इस कदम के अंतर्गत लम्बे समय में चली आ रही जमींदारी, महालवाड़ी और रैयतवाड़ी व्यवस्थाओं का पूर्ण रूपेण उन्मूलन कर दिया गया।
2. काश्तकारी सुधार: मुख्यत: तीन कदम उठाए गए - (क) लगान के नियम में बदलाव करके जोतदारों द्वारा भूमि मालिक को एक नियत दर पर लगान देने का प्रावधान बना। (ख) जमींन जोतने वाले का जोत अधिकार सुरक्षित करने के लिए संस्थागत व्यवस्था की गयी। (ग) जमींन जोतने वाले को उनके द्वारा जाते जा रहे जमीनों का मालिक बनाने की कोशिश की गयी।
3. कृषि पुनर्गठन: इसमें कई तर्कसंगत कृषि सुधार शामिल किए गए (क) भूमि का पुनर्वितरण किया गया, जिसके तहत हदबंदी कानून लागूं करके भूमिहीन गरीब किसानों को बीच, भूमि का पुनर्वितरण किया गया। (ख) भूमि की चकबंदी करके हरित क्रांति को सफल बनाने की कोशिश की गयी जो कुछ हद तक तो सफल रही परन्तु भ्रष्टाचार की भेट चढ़ जाने के कारण कई कमियां भी देखने को मिली। (ग) सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिकता के आधार पर कृषि करने के लिए सहकारी कृषि का प्रयोग किया गया तथा बड़े किसानों ने इसका प्रयोग हदबंदी कानून से अपने जमीनों को बचाने के लिए भी किया गया।
भूमि सुधार एक असफल प्रयास था जिसकी कुछ असफलताएं निम्न है -
- किसानों के काश्त अधिकारों को सुनिश्चित करने की कोशिश तो की गई परन्तु भारत की TOTAL OPERATED AREA का मात्र 4 प्रतिशत हिस्से पर ही यह लांगू हो सका।
- तथा TOTAL OPERATED AREA का मात्र 2 % हिस्से का ही स्वामित्व पुन: वितरण किया जा सका।
- भूमि सुधार का लाभ देश के मात्र 6 % हिस्सों तक ही पहुँच सका तथा सकारात्मक प्रभाव नगण्य रहा।
विफलता के कारण
- लोगो का भूमि से लगाव तथा इसे सामाजिक प्रतिष्ठा तथा पहचान का प्रतीक माना जाना।
- राजनितिक इक्षा शक्ति की कमी।
- भ्रष्टाचार तथा नेतृत्व की कमी।
भूमि सुधार तथा हरित क्रांति
भूमि सुधार तथा हरित क्रांति, दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठ पाया कारण यह था की जहाँ हरित क्रांति बड़े जोतो पर केंद्रित एक व्यवस्था थी। वही भूमि सुधार के तहत जोत के आकारों में कमी लाने का प्रावधान था। व भूमि सुधार का बड़े भूपतियों के द्वारा विरोध किया गया जबकि हरितक्रांति का कोई विरोध नहीं था। तथा हरित क्रांति का देश के खाद्यान पर सकारात्मक परिणाम देखने को मिलता है। वही भूमि सुधार का सामाजिकता पर कोई सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिलता है।
द्वितीय चरण का आधार
आर्थिक सुधार साथ ही साथ WTO के कृषि सम्बन्धी प्रावधान के चलते भारत सरकार के भूमि सुधार मुद्दे पर विकास में हमें बदलाव नजर आता है। तथा आर्थिक सर्वेक्षण 2012 - 13 के अंदर स्पष्ट तीन चरणों वाली निति उभरती दिखती है।
- भूमि का सावधानी से मानचित्रीकरण और निर्णायक शीर्षक देना।
- भूमि अधिग्रहण की एक न्याय संगत लेकिन तेज प्रक्रिया तैयार करना।
- जमींन के पट्टे की एक पारदर्शी और प्रभावी निति लांगू करना।
2008 में (NLRMP NATIONAL LAND RECORD MODERNIZATION) राष्ट्रीय भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम की शुरुआत की गई। जिसका प्रमुख उद्देश्य 12 वी योजना के अंत तक जमीन के रिकॉर्डों का नवीनीकरण और डिजिटलीकरण करना, जिससे अनुमानिक अधिकार से निर्णायक अधिकार की ओर बढ़ा जा सके।
NLRMP से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदु
डिजिटलीकरण से जमीन के सौदों की लागत में कमी आ सकती है। साथ ही साथ भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया साफ सुधरी व पारदर्शी होगी। (II) भूमि पट्टे की प्रक्रिया को आसान व पारदर्शी बनाना। (III) पट्टेदारों और जमीन मालिकों को सुरक्षा प्रदान करना। तथा इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने 2013 में भूमि अधिग्रहण विधेयक पास कर दिया। जो की भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्स्थापना कानून 2011 में संशोधन था। तथा साथ ही साथ इस विधयेक में पट्टे और अधिग्रहण से जुड़े भूमि सुधारों की आवश्यकता पर पारदर्शी प्रभावी और तेज कानून बनाने का प्रस्ताव भी था। तथा 2013 के भूमि कमियों को दूर करने के लिए सरकार के द्वारा 2015 में भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्स्थापना में पारदर्शिता और न्यायसंगत क्षतिपूर्ति का अधिकार कानून 2015 प्रस्तावित किया गया।
इस चरण के कुछ बारीक़ बिंदु
- पट्टा प्रक्रिया को तेज बनाना
- भारत में कॉर्पोरेट कृषि को बढ़ावा देना
- कृषि उत्पादन की प्रक्रिया को तेज करके वैश्विक स्तर तक पहुचाना
- भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को साफ़ सुधरा व नीतिगत बनाना
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