खनिज पदार्थ तथा प्रदेश में पाए जाने वाले विभिन्न खनिज पदार्थों का संक्षिप्त विवरण
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| Minerals |
राष्ट्र और राज्य के औद्योगिक विकास के लिए खनिज एक सबसे महत्वपूर्ण घटक है। जिसका प्रदेश की राजकोषीय आय में पांचवा महत्वपूर्ण स्थान है। तथा मध्यप्रदेश भारत का चौथा (प्रथम तीन - (1) पश्चिम बंगाल, (2) झारखण्ड (3) उड़ीसा) सबसे खनिज समृद्ध राज्य है। और प्रदेश में मुख्य रूप से 27 खनिजों का उत्पादन वर्तमान में किया जा रहा है। जिनमे मुख्य रूप में -
- हीरा
- तांबा
- मैंगनीज
- बॉक्साइड
- लोह अयस्क
- कोयला
- चीनी मिट्टी
- अग्नि मिट्टी (फायर क्ले)
- कोरण्डम
- फेलस्पार
- चुना - पत्थर
- गेरू
- सेलखड़ी (टाल्क)
- टंगस्टन
- सुरमा
- ग्रेफाइड
- अभ्रक
- एस्बेस्टस
- डोलोमाइट
- सीसा
- रॉक फॉस्फेट
- संगमरमर
खनिज पदार्थ है। इन सभी खनिज पदार्थों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है।
(1) हीरा - मध्यप्रदेश हीरा उत्खनन की दृष्टि से भारत का सबसे प्रमुख राज्य है। तथा पन्ना जिले में पन्ना, सतना जिले में मझगांव तथा हिनौता एवं छतरपुर जिले में अंगोर हीरे की प्रसिद्ध खाने है। यहाँ हीरा क्षेत्र लगभग 100 किलोमीटर लम्बाई तथा 16 किलोमीटर की चौड़ाई में फैला है। तथा मध्यप्रदेश में ही पन्ना जिले की भागने नदी द्वारा जमा किए गए निक्षेपों में रामखेरिया नामक स्थान पर, धरातल के समीप हीरों की प्राप्ति होती है। तथा मध्यप्रदेश में हीरा का उत्खनन नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन द्वारा किया जाता है।
(2) तांबा - तांबा उत्पादन में मध्यप्रदेश का प्रथम स्थान है। तथा मध्यप्रदेश में तांबा प्रमुख रूप से बालाघाट जिले की मेहर तहसील के मलाजखंड, जबलपुर के सलीमनाबाद, होशंगाबाद, नरसिंहपुर तथा सागर में मिलता है। मध्यप्रदेश में देश की सबसे बड़ी खुली खदान है। जो 170 मील लंबी तथा 20 मीटर चौड़ी है। यहाँ हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड द्वारा उत्पन्न किया जाता है। और देश में मध्यप्रदेश का मलाजखंड (बालाघाट), झारखण्ड (सिंहभूमि), राजस्थान, (झुंझनू), अलवर (खेतड़ी), महत्वपूर्ण उत्पादक है। तथा मध्यप्रदेश में देश का कुल 22 प्रतिशत तांबा उत्पादन होता है।
(3) मैंगनीज - मध्यप्रदेश को मैंगनीजके उत्पादन की दृष्टि से तीसरा स्थान हासिल है। तथा मध्यप्रदेश में देश के कुल भंडार का 24 . 64 प्रतिशत है। और यह दो प्रमुख क्षेत्र बालाघाट एवं छिंदवाड़ा में पाया जाता है। तथा मैंगनीज धातु काले रंग की प्राकृतिक भस्म के रूप में धारवाड़ युग की चट्टानों में पाई जाती है। तथा इसके प्रमुख अयस्क साइलोमेलिन व ब्रोनाइट है। व मैंगनीज की कुल खपत का 95 प्रतिशत भाग धातु निर्माण में तथा अधिकांश भाग इस्पात उद्योगों में तथा कुछ भाग मिश्र धातुओं के निर्माण में प्रयोग किया जाता है। तथा एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा फेरो मैंगनीज प्लांट भखेली (भरवेली) में लगाया गया है। तथा बालाघाट जिले की भरवेली, उकवा, तिरोड़ी, खाने मैंगनीज उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
(4) बॉक्साइड - बॉक्साइड एल्युमिनियम का अयस्क है। तथा बॉक्साइड उत्पादन में मध्यप्रदेश का पांचवा स्थान है। तथा प्रदेश के विभजनोपरांत बॉक्साइड के उत्पादन में खासा नुकसान हुआ है। प्रदेश का उत्पादन पूर्व की अपेक्षा 2 / 3 कम हुआ है। तथा प्रदेश में बॉक्साइड का प्रमुख स्त्रोत विध्यन युग की बालू शैलीका और क्वार्टज है। तथा जबलपुर के कटनी, टिकरी, टिकुरिया में बॉक्साइड के विशाल भंडार है।
(5) लोह अयस्क - मध्यप्रदेश में लोह अयस्क के भंडार कम मात्रा में पाए जाते है। तथा मध्यप्रदेश के प्रमुख लोह भंडार कैब्रियन पूर्व युग की चट्टानों की परतों के रूप में मिलते है। तथा जबलपुर के मंडला और बालाघाट में लोह अयस्क प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। और यहाँ पाए जाने वाला लोह 45 . 60 प्रतिशत शुद्ध होता है। इसके अतिरिक्त विदिशा, उज्जैन, शाजपुर, धार, झाबुआ आदि।
(6) कोयला - मध्यप्रदेश में सोहागपुर, उमरिया, तत्तापानी, झीलमिली, रामकोला, बनरस, चिरमिरी, हसदी - रामपुर और कोरबा प्रमुख कोयला क्षेत्र है। तथा सोहागपुर भारत का सर्वाधिक विस्तृत कोयला क्षेत्र है।
(7) चीनी मिट्टी - यह सफ़ेद से राख के रंग की मिट्टी है जो अत्याधिक सुघट्य तथा उच्च तापसह है और जलाने पर सिकुड़ती नहीं है। तथा चीनी मिट्टी केओलिन भी कहते है। और चीनी भाषा में केओलिन का अर्थ पहाड़ी डांडा होता है। तथा चीनी मिट्टी का उपयोग बर्तन, प्याले, कटोरी, थाली, अस्पताल में काम में लाए जाने वाले सामान, बिजली के पृथक्कारी (इंसुलेटर) मोटरगाड़ियों के स्पार्क प्लग, तापसह ईंटे इत्यादि बनाने में होता है। और कभी - कभी इसे दवा के रूप में भी खिलाते है। हैजा इत्यादि बिमारी में केओलिन दी जाती है। और छिंदवाड़ा तथा जबलपुर में और राजगढ़ की खिलचीपुर तहसील में नेवाज नदी की घाटी में तथा छिपी नदी की घाटी में चीनी मिट्टी पाई जाती है। तथा ग्वालियर में नाकुम पहाड़ी, आन्तरी तथा जबलपुर, बैतूल छतरपुर सिंधी, सतना आदि स्थानों पर भी चीनी मिट्टी पाई जाती है। और इनके प्रमुख कारखाने जबलपुर व ग्वालियर में है।
(8) अग्नि मिट्टी (फायर क्ले) - अधिकतर कोयले की खानो में पाई जाती है। और यह मिट्टी 1600 डिग्री फे तक भी नहीं जलती है। इसलिए अग्निसह मिट्टी अंगीठी, भट्टी तथा चिमनी बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। तथा मध्यप्रदेश में गोण्डवाना युग की चट्टानों में इसके निक्षेपण मिलते है। जो जबलपुर में है। और इसका उत्खनन जबलपुर शहडोल तथा पन्ना में हो रहा है।
(9) कोरण्डम - कोरण्डम एल्यूमिनियम का प्राकृतिक ऑक्साइड होता है। तथा हीरे के बाद कोरण्डम ही सबसे कठोर खनिज है। मध्यप्रदेश में कोरण्डम, पन्ना तथा सिंधी जिले के पीपरा एवं परकोटा में पाया जाता है। तथा इसका इस्तमाल समतल शीशे व क्वॉटर की सतह घिसने में होता है। और प्रदेश में इस धातु के लगभग 3 करोड़ टन भंडार मौजूद है।
(10) फेलस्पार - फेलस्पार शेलनिर्माणकारी खनिजों का सबसे महत्वपूर्ण वर्ग है। और इसके संपूर्ण उत्पादन की दो तिहाई मात्र कांच तथा चीनी मिट्टी के उद्योगों में काम आती है। उच्च श्रेणी का फेलस्पार विद्युत अवरोधी पदार्थ तथा बनावटी दांत बनाने के काम आता है। तथा मध्यप्रदेश में यह खनिज जबलपुर और शहडोल में पाया जाता है। और छिंदवाड़ा जिले में बोरगांव तथा बिधिखेड़ा में भी इसका उत्खनन किया जाता है।
(11) चूना - पत्थर - चूना - पत्थर LIME STONE एक अवसादी चट्टान है जो मुख्य रूप से कैल्शियम कॉर्बोनेट CaCO3 के विभिन्न क्रिस्टलीय रूपों जैसे कि खनिज केल्साइट या एरेगोनाइट से मिलकर बनी होती है। तथा चूना पत्थर उत्पादन में प्रदेश का तीसरा स्थान है। तथा यहाँ पाया जाने वाला चूने का पत्थर उत्तम श्रेणी का है। जिसमे 40 से 50 प्रतिशत तक चूने की मात्रा है। तथा मध्यप्रदेश में जबलपुर, कटनी, मुड़वारा क्षेत्र में चूना पत्थर के निक्षेप प्राप्त होते है।
(12) गेरू - गेरू के उत्पादन में मध्यप्रदेश भारत का अग्रणी राज्य है। तथा गेरू के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र सतना, रीवा और जबलपुर है। तथा सेमरिया तथा बरोली में भी उत्तम श्रेणी का पीला तथा लाल गेरू निकाला जाता है। जबलपुर जिले में जौली, झलवारा तथा गोगरा में भी इसकी खाने है।
(13) सेलखड़ी (टाल्क) - इसे टाल्क और स्टीएटाइट भी कहा जाता है। तथा टाल्कम पाउडर का प्रयोग प्राय: सभी घरों में होता है। और यह पाउडर खनिज टाल्क से ही तैयार किया जाता है। तथा इसका उपयोग टाइल्स बनाने में भी किया जाता है। प्रमुख रूप से यह नर्मदा घाटी से प्राप्त होता है। तथा जबलपुर में भेड़ाघाट एवं कपोड़ भी प्रमुख प्राप्ति स्थान है।
(14) टंगस्टन - टंगस्टन प्रमुख रूप से बुलफ्राम नामक खनिज से प्राप्त किया जाता है। तथा बिजली के बल्बों के तंतुओं में टंगस्टन का बहुत उपयोग होता है। और दूसरी धातुओं में मिलाने पर उनकी कठोरता बढ़ जाती है। जिस कारण टंगस्टन का उपयोग काटने के औजार बनाने में भी किया जाता है। क्योकि मिश्र धातु अम्ल, क्षार आदि से प्रभावित नहीं होती। इस कारण इस्पात उद्योग में इसका उपयोग बहुतायत से होता है। तथा टंगस्टन इस्पात के पुर्जे बहुत कठोर, टिकाऊ तथा व घिसने वाले होते है। तथा टंगस्टन खनिज मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के आगरगांव नामक स्थान से प्राप्त होता है।
(15) सुरमा - सुरमा काले रंग का होता है। तथा सुरमा का उपयोग नेत्रांजन बनाने में होता है। और मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले में यह खनिज पाया जाता है।
(16) ग्रेफाइट - ग्रेफाइट मध्यप्रदेश के बैतूल जिले पाया जाता है। तथा ग्रेफाइट का उपयोग पेन्सिल की लीड तथा घड़ियों की कमानी बनाने में होता है। तथा उच्च ताप पर चलने वाली मशीनों में इस्कॉन तेल या पानी के साथ मिलाकर स्नेहक के रूप में प्रयोग किया जाता है। तथा धातुओं को पिघलाने के लिए क्रूसिबल बनाने में इसका उपयोग किया जाता है।
(17) अभ्रक - मध्यप्रदेश में अभ्रक ग्वालियर की कडप्पा शैलों में मिलता है। यह विद्युत का कुचालक है। अत: इसका प्रयोग विद्युत उद्योग में अधिक होता है। तथा विद्युत कुचालक होने के कारण इसका उपयोग कंडेंसर, कम्यूटेटर, टेलीफोन, डायनेमों आदि के काम में होता है। तथा पारदर्शक व तापरोधक होने के कारण यह लेम्प की चिमनी स्टोप, भट्टियों आदि में प्रयुक्त होता है। अभ्रक के छोटे - छोटे टुकड़ों को चिपकाकर माईकानाइट बनाया जाता है।
(18) एस्बेस्टस - एस्बेस्टस का उपयोग विद्युतरोधक अथवा उष्मारोधक (इन्स्युलेटर) बनाने में किया जाता है। तथा इससे अग्निरक्षक परदे, वस्त्र और ऐसी ही अन्य वस्तुएं बनाई जाती है। तथा भारत में एस्बेस्टस का मुख्य उपयोग एस्बेस्टस युक्त सीमेंट तथा तत्संबंधी वस्तुएं जैसे - स्लेट, टाइल, पाइप और चादरे बनाने में किया जाता है। तथा मध्यप्रदेश में इसका उत्पादन झाबुआ जिले में होता है।
(19) डोलोमाइट - जब चूना पत्थर में 10 प्रतिशत से अधिक मैग्नीशियम होता है। तो वह डोलोमाइट कहलाता है। और जब यह अनुपात 45 प्रतिशत से अधिक हो जाता है। तो इसे शुद्ध डोलोमाइट कहते है। और इसका उपयोग लोग साफ़ करने में किया जाता है। तथा इसका 90 प्रतिशत उपयोग लोहा - इस्पात उद्योग में होता है। 4 प्रतिशत उर्वरक 2 प्रतिशत शीशा तथा मिश्र धातु में उपयोग किया जाता है। तथा शेष उद्योगों में प्रयोग किया जाता है। और मध्यप्रदेश में इसके प्रमुख क्षेत्र जबलपुर, सतना, सीधी, झाबुआ, ग्वालियर और इंदौर है।
(20) सीसा - मध्यप्रदेश में जबलपुर, होशंगाबाद, दतिया, शिवपुरी, व झाबुआ जिलों से सीसा प्राप्त होता है।
(21) रॉक फॉस्फेट - मध्यप्रदेश में झाबुआ जिले में रॉक फॉस्फेट पाया जाता है। जबकि सागर और छतरपुर में भी इसके भण्डारों का पता चला है। रॉक फॉस्फेट का सर्वाधिक प्रयोग फॉस्फेट उर्वरकों के निर्माण में होता है।
(22) संगमरमर - संगमरमर एक कायांतरित शैल है। जो की चूना पत्थर के कायांतरण का परिणाम है। यह अधिकतर कैलसाइट का बना होता है। जो कि कैल्शियम कॉर्बोनेट CaCo3 का स्फटिकीय रूप है। तथा जबलपुर में भेड़ाघाट तथा गावरीघाट, बैतूल, सिवनी तथा छिंदवाड़ा में आर्कियन युग की चट्टानों में संगमरमर के भण्डार मिले है।

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