मगध राज्य का उत्कर्ष
बिम्बिसार पुत्र अजातशत्रु
16 महाजनपदों में से, एक मगध महाजनपद की उत्पत्ति हुई। जहाँ सर्वप्रथम हर्यक वंश सामने आया तथा इस वंश का संस्थापक बिम्बिसार था। और इसका समयावधि काल 544 बी. सी से 492 बी. सी तक रहा।
बिम्बिसार ने सर्वप्रथम राजगृह (ग्रिहिब्रज) को अपनी राजधानी बनाया। तथा अंग महाजनपद पर अधिकार करके अपने साम्राज्य को विस्तार भी दिया। बिम्बिसार ने स्वयं को शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से शक्तिशाली महाजनपदों के साथ व्यावहारिक सम्बन्ध स्थापित करने की योजना बनायीं और इस पहल में उसने सर्वप्रथम कौशल राज्य की राजकुमारी प्रसन्नजीत की बहन महाकोशला और उसके बाद लिच्छवि (वैशाली) राजकुमारी चेलना के साथ विवाह किया।
लेकिन 492 बी. सी. में बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु ने अपने पिता की हत्या करके स्वयं गद्दी पर बैठ गया।
अजातशत्रु
अजातशत्रु ने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या करने के बाद सत्ता प्राप्त की और अपनी महत्वकांक्षा पूरी करने के लिए उसने कशी महाजनपद पर आक्रमण किया, तत्पश्चात उस पर विजय प्राप्त करके अपने राज्य में शामिल कर लिया। उसके बाद वज्जि संघ (लिच्छिवगड) पर आक्रमण करने की योजना बनाई लेकिन इसमें भी यह सफल रहा।अजातशत्रु ने दो नए हथियार रथमूसल और महाशिला कण्टक की सहायता से वज्जि संघ पर अधिकार करने में अजातशत्रु सफल हो गया।
इसके बाद महात्मा बुद्ध के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुआ। जिससे अजातशत्रु ने बौद्ध धर्म स्वीकार्य कर लिया। और महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद 483 बी. सी में प्रथम बौद्ध संगति का आयोजन करवाया। और लगभग 461 बी. सी में अजातशत्रु के पुत्र उदायन ने, अजातशत्रु की हत्या कर दी और स्वयं गद्दी पर बैठ गया।
अजातशत्रु पुत्र उदायन (उदायिन)
उदायन ने सत्ता प्राप्त करने के पश्चात् जैन धर्म स्वीकार कर लिया और अहिंसावादी निति को प्रारंभ किया। जिसके आधार पर उसने साम्राज्यवादी निति को छोड़ दिया फिर उदायन ने राजधानी परिवर्तन करने की योजना बनाई, इसके लिए उदायन ने गंगा व सोन नदियों के संगम पर कुसुमपुर पाटलीपुत्र पोलीब्रोया (यूनानी) नमक नगर बसाया। और बाद में इसे मगध महाजनपद की राजधानी के रूप में स्थापित किया। कुछ समय पश्चात् उदायन के पुत्र ने उदायन की हत्या कर दी और स्वयं गद्दी पर बैठ गया। लेकिन उदायिन के पश्चात् किसी बड़े शासक की जानकारी नहीं मिलती।
लेकिन इस वंश का अंतिम शासक नागदशक हुआ। तथा नागदशक की हत्या, इसके ही अमात्य (मंत्री) शिशुनाग ने कर दी और मगध में नागवंश की स्थापना की।
नागदशक अमात्य मंत्री शिशुनाग नागवंश
नागवंश का संस्थापक शिशुनाग था। और शिशुनाग एक महत्वाकांक्षी शासक था। और शिशुनाग ने साम्राज्य विस्तार करते हुए सर्वप्रथम सबसे पहले अवन्ती पर आक्रमण किया। और यह मगध साम्राज्य का पहला शासक था। जिसने अवन्ती पर विजय प्राप्त की थी। फिर शिशुनाग ने लिच्छवि वैशाली पर आक्रमण किया फलस्वरूप शिशुनाग ने विजय प्राप्त कर इसे अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
फिर शिशुनाग के पश्चात् (काकवर्ण) कालाशोक गद्दी पर बैठा फिर इसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया तथा कालाशोक की मृत्यु के पश्चात् किसी अन्य इस वंश के महँ शासक की जानकारी नहीं मिलती है। तथा इस वंश का अंतिम शासक नंदिवर्धन (महानन्दिन) हुआ। जिसकी हत्या एक शूद्र व्यक्ति महापरमानन्द के द्वारा कर दी गयी।
| शिशुनाग | अवन्ती, लिच्छवि, वैशाली |
| कालाशोक | बौद्ध धर्म स्वीकार |
| नंदिवर्धन | अंतिम शासक |
महापरमानन्द मगध का सबसे शक्तिशाली शासक नदवंश हुआ। तथा महापरमानन्द सूद्र जाति का शासक था। लेकिन इसने स्वयं की द्वितीय भार्गव (परशुराम का अवतार) कहा। और इसे सर्वक्षात्रांतर क्षत्रियों का नाश करने वाला कहा। और इसने साम्राज्य विस्तार के लिए कलिंग उड़ीसा पर आक्रमण किया और वहां के किसानों की दयनीय स्तिथि देखकर यहाँ पर नहर का निर्माण करवाया।
फिर महापदमनंद के बाद इसका सबसे छोटा पुत्र धनानन्द गद्दी पर बैठा।
महापदमनंद पुत्र धनानन्द
धनानन्द एक अत्याचारी शासक था। इसने जनता पर जब अत्यधिक कर लगाकर उनका शोषण करना प्रारंभ किया। तब तक्षशिला के आचार्य चाणक्य ने उसको समझाने का प्रयास किया। लेकिन धनानन्द ने चाणक्य का अपमान करते हुए उसे महल से बाहर फेकवा दिया।
फिर उसी समय चाणक्य ने अपनी शिखा (चोटी) को खोलकर शपथ ली। की "जब तक मैं इस वंश का समूल नाश नहीं कर दूंगा तब तक मै अपनी चोटी नहीं बांधूगा"।
फिर चाणक्य ने छोटे से बालक चन्द्रगुप्त मौर्य को उच्च शिक्षा दीक्षा देकर धनानन्द के वंश का नाश कर दिया और चन्द्रगुप्त मौर्य को एक अखिल भारतीय सम्राट के रूप में लेकर सामने आया और मगध में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
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